पंथ की कठिनाईयों मान लूं मैं हार ये संभव नही हैं…

झाबुआ पोस्ट. गोपालदास नीरज का जन्मदिन था..4 जनवरी को….
एक ऐसा कवि जिसकी रचनाएं प्रेरणा देती है…रास्ता दिखाती हैं….विद्रोही ही भी है….प्रेमी भी है….चिंतक भी है…..समाजसेवी भी हैं……दार्शनिक भी है…..लोगों को शायद कम ही पता होगा इनके बारे में…..युवा पीढ़ी को तो शायद ही नाम याद हो…मैें कुछ फिल्मी गीतों का जिक्र किए देता हूं ताकि आपके जहन में नीरज आ जाए…..
ए भाई जरा देख के चलो…आगे भी नहीं पी16_1छे भी …..
हर बार मैं यही अपराध करता हूं….आदमी हूं और आदमी से प्यार करता हूं…..

कविताएं तो ढेरो हैं……
खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में
मैंने भर-भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा…
और भी कईं……

लेकिन आज बात नीरज के लिखे गीतों की….कवि नीरज की इंट्री फिल्म जगत में उस वक्त हो रही थी….फिल्मी गीत लेखन पर शायरों का एकाधिकार था……सीधे -सरल भाषा में कविता के लहजे वाले गीत लिखकर नीरज ने जो लोकप्रियता बटोरी वो बेमिसाल है……..याद कीजिए प्रेम पूजारी का एक-एक गीत………
.
फूलों के रंग से दिल की कमल से लिखी तुझको रोज पाती….
शौखियों में घोला जाए…..फूलों का शबाब…

रंगीला रे…..तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन
छलिया रे…ना बुझे है किसी जल ये जलन…..

याद आया ना कवि नीरज के शब्दों का जादू…..

गीत का अंतरा देखिए…..

दुख मेरा दुल्हा…बिरहा है डोली
आंसू की साड़ी है….आहों की चोली
आग मैं पीयूं रे,…..जैसे हो पानी
नारी दीवानी हूं…..पीड़ा की रानी
मनवा ये जले है…जग सारा छले है……
सांस क्यूं चले है…पिया….रंगीला रे……
……..
एक गीत का जिक्र देखिए……इस गीत के बार में, मैं आपको बता देना चाहता हूं कि कई लोगों को इस गीत के बार में गलतफहमी है….. कि ये गीत शैलेन्द्र ने लिखा है….क्योंकि राजकपूर की अममुन फिल्मों के गीत शैलेन्द्र ने लिखे हैं….इसलिए धोखा होना स्वाभाविक था….लेकिन मेरा नाम जोकर के इस गीत में कवि नीरज ने दार्शनिक अंदाज में जीवन का सार रख दिया……गीत के बोल हैं….

ऐ भाई जरा देख के चलो…..
आगे ही नहीं पीछे भी, दायें ही नहीं बाँये भी
ऊपर ही नहीं, नीचे भी.. ऐ भाई..
तू जहाँ आया है, वो तेरा
घर नहीं, गाँव नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, दुनिया है………

और प्यारे दुनिया ये सरकस है और सरकस में..
बडे को भी छोटे को भी, दुबले को भी मोटे को भी, खरे को भी खोटे भी
ऊपर से नीचे को, नीचे से ऊपर को आना-जाना पडता है..
और रिंग मास्टर के कोडे़ पर…
कोडा़ जो भूख है, कोडा़ जो पैसा है, कोडा़ जो किस्मत है,
तरह-तरह नाच के दिखाना यहाँ पडता है,
बार-बार रोना और गाना यहाँ पडता है,
हीरो से जोकर बन जाना पडता है…
ऐ भाई……

अब बताईये इस एक गीत में गीता का सुक्ष्म ज्ञान छुपा हुआ है कि नहीं…..ऐसे कई गीतों को टटोलिये आप इन गीतों में शब्दों की वो जादूगरी महसुस करेंगे कि….बस मुंह से वाह ही निकलेगा…..जिन लोगों ने इन गीतों नहीं सुना है एक बार सुनकर देखें…..मौजूदा दौर की बेवजह कि तुकबंदी वाले गानों से क्यों चिढ़ होती है ये समझ में आ जाएगा……कवि नीरज ने कविता के साथ-साथ शायरी भी की….और बखूबी की….

कवि नीरज 90 बरस के हो चुके हैं…..लेकिन आज भी महफिलों और मंचों की रौनक हैं….लेकिन बकौल नीरज अब कवि सम्मेलन कवि सम्मेलन नहीं रहे….वे कपि सम्मेलन बन चुके हैं….जहां उछल-कूद और द्विअर्थी संवादों को ही कवि सम्मेलन मान लिया गया है……ये ही कारण है कि रात से लेकर सुबह तक चलने वाले कवि सम्मेलन अब दिखाई नहीं पड़ते हैं…….
कवि नीरज के जन्मदिन पर ईश्वर से यही प्रार्थना की वे दीर्घायू हो….स्वस्थ रहे…कलम, कविता और शब्दों की जादूगरी से पाठक, श्रोताओं को बस इसी तरह मस्त करते रहें……।

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