मूफलसी में कट रहा ननीहालों का जीवन. दुसरों का काम देख कर सीख रहे ईंट बनाना , जागरूकता की जरूरत

IMG_20150122_143610 copyमेघनगर ( राजेन्द्र सिंह सोनगरा ) यू तो हीरा भी खदान से कांच की तरह निकलता है पर तराशने के बाद उसी कांच की कीमत करोड़ों में हो जाती है । ऐसी ही कहावत झाबुआ जिले के वनवासी और ग्रामीण हुनरबंद बच्चों पर भी लागू होती है । सरकार सब पढ़ो सब बढ़ों के सिद्धांत पर शिक्षा का दीप जलाने की कोशिश कर रही है । पर यहां मूफलसी कुछ ऐसी है कि बच्चे कभी गाय- भैंस चराते तो कभी खेतों में काम करते दिखते हैं । गरीबी और अशिक्षा का दंश अभी भी इस अंचल को अपने आगोश में लिये हुए है वरना यहा हुनरबाजों की कोई कमी नहीं ।

                आदिवासी जिले के इस अंचल में पढ़ाई लिखाई से पहले कमाई के जरिये ग्रामीण अपने बच्चों को सिखाने में विश्वास रखते हैं । पालक और अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से पहले उन्हें जंगल में बकरियां चराने और होटलों पर काम करवाने में ज्यादा ध्यान देते हैं । इसका कारण गरीबी और तंगहाली है । आदिवासी बाहुल जिले के लिए भले ही सरकार ने अपनी तिजोरियां खोल रखी हो किंतू इसका उपयोग केवल सक्षम और शिक्षित आदिवासी वर्ग ही उठा पा रहा है । गरीब आदिवासी और वनवासी आदिवासी आज भी सरकारी सुविधाओं से मौहताज ही नज़र आता है । कुछ ऐसा ही वाक्या झाबुआ- मेघनगर मार्ग में पढ़ने वाले ईट भट्टों पर दिखाई दिया । झाबुआ मार्ग पर स्थिति कुछ ईट भट्टों पर ग्रामीण आदिवासी जन ईटों के निर्माण काम में लगे हैं । इन मजदूरों के छोटे बच्चे जिसमें एक वर्ष के बच्चें से लेकर चार से छह वर्ष की बच्चियां भी शामिल है । इन बच्चों के नाम भले ही आसपास की आंगनवाडी या प्राथमिक विद्यालय में दर्ज होंगे पर ये स्कुल नहीं जाते । ये बच्चें अपने मां-बाप के साथ रहते हैं । फिर चाहे तपती दोपहरी हो या ठिडुरन भरी शामें  ।  इन बच्चों की समझ की जितनी तारीफ की जाए शायद उतनी कम होगी । मां-बाप को ईट बनाते देख इन आधा दर्जन नन्हें हुनरबाजों ने अपना ही ईट निर्माण भट्टा खोल लिया । छोटे से पेड़ की छांव में मिट्टी का घोल तैयार किया फिर एक जैसी आकृति में मिट्टी को जमा कर उसे सुुखाया फिर कर ली अपनी ईट तैयार । इन सोच और उमंग लिये इन हुनर बाजों को यदि तराशा जाये तो ये देश की प्रगति के सच्चें भागीदार बन सकते हैं । छोटी उम्र में नई सोच रखने वाले इन बच्चों के उज्जवल भविष्य को जिम्मा ना सिर्फ उनके गरीब मां-बाप बल्कि समाज के जिम्मेदार नागरिक और सरकार का भी है । स्कूलों और आंगनवाडियों में इन बच्चों के नाम का मध्यान भोजन , दलिया और खिचड़ी पूरी हाजरी बता कर भष्टाचार की भेंट चढ़ा दी जाती है । अशिक्षा का दंश इन हूनरबाजों के हूनर को रसातल के गर्त में ले जा रहा है । सरकार साक्षर भारत, प्रौढ़ शिक्षा, साक्षरता अभियान ऐसे कार्यक्रमों पर लाखों खर्च करती है किंतू इस खर्च का कितना सार्थक परिणाम आ रहा है यह भी एक विचारणीय प्रश्न बनता जा रहा है । सोचने वाली बात तो यह है कि जब दो तीन वर्ष के नन्हें बच्चें बड़ों का अनुसरण कर इस तरह के कार्य कर सकते हैं तो उनमें नया सिखने की कितनी प्रबल संभावना है इसकी कल्पना मात्र की जा सकती है ।

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सामाजिक संगठनों के साथ-साथ सरकारी मशीनरी को इस क्षेत्र में कम से कम नन्हें बच्चों की शिक्षा से जुड़े मुद्दे पर ईमानदारी से काम करना होगा तभी इस तरह की स्थितियों से निपटा जा सकेगा । बच्चों का भविष्य बनने की जगह बिगड़ता जा रहा है । तमाम सरकारी सुख सुविधाओं के बावजूद यदि आदिवासी वर्ग का बच्चा शिक्षित नहीं हो पा रहा तो इसमें कमी कहां है इसे सरकार को समझना होगा । श्रमिक कल्याण के लिए भी मध्यप्रदेश में कई नीतियां बनी है । श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा के लिए भी शासन स्तर पर व्यवस्थाएं की गई है किंतू इसका कितना पालन झाबुआ जिले में होता है इसके यहां वहां हर जगह जीवित उदाहरण देखने को मिल जाते हैं । कभी बच्चें मां-बाप के साथ उनके कामों में हाथ बंटाते तो कभी अपने नन्हें भाई बहनों की परवरिश में ही इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें पढ़ने का समय ही नहीं मिलता ।

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Categories: मेघनगर

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