भागवत कथा का दूसरा दिन . दम्भ का दशक होता है ,मगर सत्य की तो शताब्दियां होती है- स्वामी कृष्णशरण देवजी

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भागवत कथा में प्रवचन देते स्वामी श्री बालकृष्णशरण देव जी .

झाबुआ पोस्ट ।  गंभीरता और मौन दो ऐसे मंत्र है, जिनके द्वारा हर समस्या का सामना किया जासकता है । क्रोध पहले स्वयं की हानि करता है, फिर दूसरों की । सदा प्रसन्न रहना ही हमारे शत्रुओं के लिये सबसे बडी सजा है । किसी को कष्ट पहूंचा कर क्षमा मांग लेना बहुत आसान है, लेकिन खुद चोट खाकर किसी को माफ कर पाना बहुत कठिन है । उक्त सार गर्भीत विचार स्थानीय श्री मद््भागवत ज्ञान गंगा समिति द्वारा आयोजित श्री मद भागवत कथा के प्रथम दिन व्यास पीठ से पूज्य डॉ. स्वामी कृष्णषरण देवजी महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रथम दिन की कथा के दौरान व्यक्त किये ।

12 अप्रेल से 19 अप्रेल तक  तीर्थेन्द्रधाम पर आयोजित श्री मद्भागवत कथा के प्रथम दिन बडी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य स्वामीजी ने कहा कि हमारा व्यक्तित्व हमें दूसरों से अलग बना सकता है, मगर हमारा अंहकार हमें दूसरों से अलग कर देता है । जीवन में अधिक रिष्ते होना महत्वपूर्ण नही मगर रिष्तों में  अधिक जीवन होना जरूरी है । अच्छे लोगों का संपर्क मिलना हमारा भाग्य है, मगर उन्हे संभालकर रखना हमारा हुनर है । आपकी दृष्टि भली होगी तो आपको दुुनिया अच्छी लगेगी, यदि आपकी जुबान अच्छी होगी तो आप दुनिया को अच्छे लगेंगें । यदि आप सही है तो गुस्सा करने  जरूरत नही और यदि आप गलत है तो गुस्सा करने का आपको अधिकार नही ।

स्वामीजी ने आगे कहा कि जीवन में चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिये तो समर्पण को खर्च करना होगा । विष्वास चाहिये तो निष्ठा खर्च करनी होगी , साथ चाहिये तो समय खर्च करना होगा । जो भाग्य में है तो कहीं से भी आएगा । पानी मर्यादा तोडे तो विनाष और वाणी मर्यादा तोडे तो सर्वनाष । जो आप पर विष्वास करे उससे झुठ मत बोलों और जो आपसे झूठ बोले उस पर विष्वास मत करों ।

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हाउसिंग बोर्ड तीर्थेन्द्र नगर में चल रही भागवत कथा को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धलु आ रहे हैं ।

भागवत के प्रथम ष्लोक की व्याख्या करते हुए पूज्य स्वामी कृष्णषरण देवजी महाराज ने कहा कि दम्भ  का दषक होता है मगर सत्य की तो शताब्दियां होती है । कुंती स्तुति में आपने बताया कि परिस्थितियों को सुधारने का आग्रह छोड कर स्वीकारने का भाव आरंभ कर देना चाहिये । उन्होने कथा में कहा कि भोतिक विज्ञान पहले जानता है फिर मानता है किन्तु आध्यात्म विज्ञान पहले मानता है फिर जानता है । श्रीराम का दृष्टांत देते हुए उन्होने कहा कि  पिता की आज्ञा पालन को उन्होने प्राथमिकता दी थी  । नमन की व्याख्या करते हुए उन्होने बताया कि ’न’ मन की भावना पैदा होते ही इच्छा चाह,कामना नही रही । संकल्प का अर्थ ही ईष्वर प्रेरित सभी कार्य है ।उन्होने कहा कि मनुष्य को मृत्यु के समय तक संसार में प्रवृत रहना चाहिये यहा तक कि श्मषान में भी  प्रवृत रहना चाहिये । गज एवं गा्रह के दृष्टांत को बताते है उन्होने गृहस्थी का संधी विभाजन करते हुए कहा कि गा्रह एवं हस्ती मिल कर ही गृहस्थी बनी है जहां दोनों पक्ष अपनी ताकत की आजमाईष करते है और अपनी और ख्ंिाचते है । ऐसे में सत्संग बहुत ही कारगर उपाय है । संत्संग बहुत ही दुर्लभ है और नामस्मरण इसे प्राप्त करने का प्रभावषाली एवं आसान उपाय है ।

तीर्थेन्द्रधाम में चल रही श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिन सांयकाल 3 बजे से 6 बजे तक भागवत कथा रस प्रवाह में श्रद्धालुओं का तांता लग रहा है । इस अवसर पर राधेष्याम परमार एवं शरतषास्त्री ने संचालन करते हुए कथा के प्रारंभ में पूज्य स्वामीजी की विलक्षणता एवं उनके जीवन परिचय की जानकारी दी । कार्यक्रम के अंत में महामंगल आरती एवं प्रसादी वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ ।

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Categories: धर्म-संस्कृति

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