प्रशासन को शॉपिंग फेस्टिवल से प्यार, लेकिन हाट बाजार से परहेज ।

झाबुआ पोस्ट । जिले में यूं तो प्रशासन का चेहरा मोहरा ही बदल गया है । पूराने डीएम के जाते ही, अच्छी व्यवस्थाएं ध्वस्त होती जा रही हैं । और जिन व्यवस्थाओं को उसी वक्त खत्म हो जाना था, वो आज भी वैसे ही जारी है ।

झाबुआ में रविवार को लगने वाले हाट बाजार को यातायात व्यस्था का हवाला देते हुए कृषि उपज मंडी प्रांगण में स्थानंतरित किया गया । छोटे दुकानदारों ने विरोध भी किया । ये वो छोटे दुकानदार जो इन साप्ताहिक हाट बाजारों की रौनक हैं, और जिले की आदिवासी की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाते हैं । रविवार को झाबुआ तो सोमवार को नया पड़ाव । कमाल की बात ये भी है कि ये लोग कोई वीकली ऑफ नहीं लेते । इन्हें सातों दिन जाना होता है, क्योंकि कोई इनका इंतजार कर रहा होता है । सालों इनका व्यापारिक संबंध ना जाने कितने लोगों से बन गया है । सेठ और ग्राहक की पीढ़ियां बदल गई, लेकिन ये हाट बाजार के जरिये बना रिश्ता आज भी कायम है ।

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इस रिश्ते को तोड़ने की कोशिश की सालों से जो हाट बाजार की परंपरा चली आ रही थी उसे यातायात व्यवस्था के नाम पर बदलने की कोशिश की गई । साप्ताहिक हाट बाजार में आने वाले दुकानदारों को मंडी प्रांगण में भेज दिया गया । प्रशासन का साफ कहना था कि सड़क पर दुकानें नहीं लगाने दी जाएंगी । कलेक्टर बोरकर के जाते ही लोगों को लगा कि व्यवस्था तोड़ी जा सकती है, फिर से आ जमे सड़कों पर लेकिन नगरपालिका के अमले फिर इन छोटे दुकानदारों के सामन को जब्ती के नाम पर लूट लिया । कई नगरपालिका कर्मचारियों के लिए तो चुहे बिल्ली का खेल और मनोरंजन का जरिया बन गया है । छोटा दुकानदार जब उन्हें देख के भागता है, तब उन्हें बड़ा आनंद मिलता है । गरीब आदिवासी के सामान को लूटना इनका शगल बन गया है,  और उस गरीब की बेबसी का मजाक उड़ाना इन्हें काम का हिस्सा नजर आता है । उम्मीद है प्रशासन इस और ध्यान देगा गरीबों जबरन पहुंचाए जाने वाले इस नुकसान बचाने के लिए कोई कदम उठाएगा । लेकिन जिम्मेदारों को इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि जब शहर में रोज ही यातायात व्यवस्था चरमरा रही है एक दिन की मशक्कत के पीछे साप्ताहिक हाट बाजार हटाकर नगर की रौनक क्यों खत्म की जा रही है ?  क्यों सालों से चले आ रहे ग्रामीण लोगों और दुकानदारों के इस रिश्ते को खत्म किया जा रहा है । क्यों नगर की इस सांस्कृतिक पहचान को छीना जा रहा है । एक दिन के लिए कोई व्यवस्था बनाकर हाट बाजार को व्यवस्थित किया जा सकता है ।

P1020081ये तो एक तस्वीर है । दूसरी तस्वीर इसके बिल्कुल उलट है । प्रशासन को नगर के यातायात की इतनी ही चिंता है तो क्यों उसने नगर के दिलीप क्लब स्थल पर शॉपिंग फेस्टीवल की इजाजत दी । शॉपिंग फेस्टविल के आयोजकों को क्यों इस बात की हिदायत नहीं दी गई ये प्रांगण है आपको मेला भी यहीं लगाना है, और पार्किंग व्यवस्था भी यहीं करना है । मेला देखने आने वाले लोग अपने दो पहिया और चार पहिया वाहन सड़क पर खड़ा करते हैं, जिसमें सुबह से लेकर शाम तक यहां जाम जैसी स्थिति रहती है और यातायात तो प्रभावित हो ही रहा है ।

तो क्या प्रशासन हिम्मत दिखा पाएगा वैसी ही जैसी हाट बाजार के दुकानदारों पर दिखाई जाती है, भगाया जाता है, सामान जब्त किया जाता है ।

P1020082शायद ऐसा नहीं होगा, क्योंकि हाट बाजार और शॉपिंग फेस्टिवल में अंतर होता है । ये अंतर बहुत बड़ा है । ये भारत और इंडिया  के बीच एक लकीर खींचता है । ये अंतर अर्बन और रूरल का है । ये अंतर आम इंसान और कॉमन मैन के बीच का जो कॉमन होकर भी कॉमन नहीं । इस अंतर को पाटिए साहब । एक दिन के हाट बाजार से अगर यातायात व्यवस्था बाधित हो रही थी तो फिर आपने सप्ताह भर से ज्यादा के लिए कैसे इस शॉपिंग फेस्टिवल के लिए इजाजत दे दी । वो पार्किंग के इंतजाम के बिना । क्यों आप इतनी हिम्मत नहीं दिखा पाए कि आप कृषि मंडी जाईये यहां यातायात प्रभावित होगा । शहर का नागरिक खुश है कि सड़के चौड़ी हो गई हैं, लेकिन सप्ताह में एक दिन भीड़ भी उसे मंजूर है ।

और फिर एक ही कारण के लिए दो व्यवस्थाएं कईं सवाल खड़े करती हैं । प्रशासन को अपने इस दोहरे मापदंड वाले चेहरे को बदलना होगा । अगर ऐसा हो जाए तो गरीब के मन ये उम्मीद रहेगी की नियम कानून सबके लिए एक से होते हैं । वरना बाकी तो जो है सो है ही ।

 

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