महिला का शव 5 दिन तक करता रहा पति का इंतजार, संवेदनहीनता की पूरी कहानी, आपको झकझोर देगी ।

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9 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चद्रशेखर आज़ाद नगर भाबरा में जरा याद करो कुर्बानी कार्यक्रम में भाग लेने आ रहे हैं, आज़ादी मिले हमें 70 साल जो हो रहे हैं उसी का जश्न अलग-अलग जगह मनाया जाना है, लोगों में देशभक्ति की भावना का संचार करना है । लेकिन सरकार और सरकार के अधिकारियों में इस देशभक्ति की भावना ज्यादा जरूरी और ये इस तरह के कार्यक्रम से नहीं आएगी, ये आएगी  आम लोगों की समस्याओं और उनके दुख दर्द में शामिल होने से, आम आदमी की परेशानी को अपनी परेशानी समझने से । आम आदमी की बात जब सरकारी दफ्तरों में ध्यान से सुनी जाने लगेगी तो फिर सुराज आएगा । फिर गर्व भी होने लगेगा की मेरा देश महान है, यहां किसी गरीब, किसी मजबूर , किसी बेसहारा का आवाज कहीं गुम नहीं होती बल्कि किसी समाधान तक पहुंचती है । इस स्वीकारोक्ति के लिए कोई कार्यक्रम की जरूरत नहीं होगी . लोग अपने आप बोलगें, सरकारों के जयकारे लगाएगें, साहेब और मामा के भी खूब गुण गाएंगे लेकिन वो दिन अभी दूर है ।

शायर अदम गौंडवी ने क्या खूब कहा है कि

तुम्हारी फाइलों में गांवों का हाल गुलाबी है ।

ये आकड़े झूठे हैं, ये दावे किताबी हैं ।

आम आदमी की बेहतरी को लेकर लाख दावे हो लेकिन झाबुआ जिले में की एक घटना ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाकई बड़ी कुर्सियों  पर बैठे लोगों को आम जनता से कोई मतलब है भी या नहीं । झाबुआ के सातसेरा गांव  में एक महिला की मौत के बाद उसका शव 5 दिन तक घर में रखा रहा, परिजन महिला के पति के आने का इंतजार करते रहे लेकिन सरकारी कागज के अभाव में पति अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच सका । सरकारी कागज कई दफा दब जाते, टोकरी में पहुंच जाते हैं, लेकिन ये घटना शर्मसार करने वाली है, परिजनों का आरोप है  कि गुहार, आवेदन लगाने के बाद भी संवेदहीन झाबुआ प्रशासन एक पत्र न लिख सका ।

महिला का नाम संम्बुड़ी बाई जिसकी लंबी बीमारी के चलते रविवार को मौत हो गई । महिला का पति रेवसिंह मेड़ा अलग-अलग अपराधों में इंदौर सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है । अंतिम संस्कार के लिए इंदौर सेंट्रल जेल ने झाबुआ कलेक्टर के पत्र के बिना रेवसिंह को उसके गांव ले जाने से मना कर दिया । परिजनों का कहना है कि  सोमवार को कलेक्टर और एडिशनल एसपी सीमा अलावा को उन्होंने आवेदन पत्र दिया था । कलेक्टर से परिजनों की सीधी बात नहीं हो पाई क्योंकि आम लोगों से मैडम कम ही इत्तेफाक रखती हैं, आवेदन बाबु को दिया और फिर शायद वो आवेदन किसी रद्दी की टोकरी में जा पहुंचा होगा । लेकिन झाबुआ प्रशासन की इस संवेदहीनता के चलते परिवार में खासा गुस्सा है । रेवसिंह के भाई कहते हैं कि हमारी कहीं सुनवाई नहीं हुई । 5 दिन तक शव को रखना मजबूरी थी, क्योंकि भाई ने कहा था कि वो अंतिम संस्कार में जरूर आएगा ।

रेवसिंह के 6 बच्चे हैं…सबसे बड़ा बेटा भी झाबुआ जेल में हैं…जबकि दो बच्चों की मौत इसी साल पानी में डूबने से हो गई…अब तीन छोटे बच्चे हैं..जिनके ऊपर ना पिता का हाथ है और ना ही मां का साया….रेवसिंह के भाई ने एडिशनल एसपी सीमा अलावा से भी गुहार लगाई लेकिन नतीजा सिफर ही रहा । 5 दिन तक सम्बुड़ी का शव घर में रखा रहा…लोगों ने लकड़ी की पेटी में बर्फ से सुरक्षा करने की कोशिश भी लेकिन शव गलता रहा और उसकी बदबू भी बढ़ती रही….गुरूवार सुबह इंदौर सेंट्रल जेल में बंद रेवसिंह भी हिम्मत हार गया और सुबह 9 बजे अपने भाईयों से कहा कि उसका आना मुश्किल है,पत्नी का अंतिम संस्कार कर दिया जाए…जिसके बाद गुरूवार शाम को संम्बुड़ी का अंतिम संस्कार किया गया वो भी पूरे पांच दिन बाद…इस बीच रेवसिंह का परिवार कलेक्टर कार्यालय और एसपी कार्यालय के चक्कर काटता रहा,  गुहार लगाता रहा लेकिन आम आदमी का कागज साहब लोगों की अकड़ के आगे टीक ना पाया । कलेक्टर के व्यवहार को लेकर लोगों में गुस्सा है, चाहते हैं कि यहां से तबादला भी हो जाए लेकिन आम आदमी का कागज रद्दी की टोकरी में पुहंच जाता है और उसकी आवाज गुलाबी भवन की दीवार से टकराकर ही खामोश हो जाती है ।

 

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