आम आदमी की समस्या पर,2 माह बाद भी नहीं आया CEO सा.का जवाब !

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संचार के माध्यम बदल रहे हैं, और ये तरीके दिन ब दिन तेज , और तेज , और तेज होते जा रहे हैं । संचार यानी कि कम्यूनिकेशन में वहीं संवाद या बातचीत या वार्तालाप सफल माना जाता है जिसमें फीडबैक मिले । बिना फीडबैक के संचार कि प्रक्रिया अधूरी मानी जाती है । एक तरफा संवाद या अधूरा संचार है तो या तो सेंडर की तरफ से दिक्कते हैं कि रिसीवर संदेश को समझ नहीं पाया, या किसी तकनीकी दिक्कत की वजह से कोई बाधा आ गई हो और रिसीवर तक संदेश पहुंच ना पाया हो ।

आपको संचार की इस प्रक्रिया और इन बातों से अवगत कराने का मतलब ये था कि आज हम जिस वाक्ये की बात करने जा रहे हैं, उसके सेंडर (संदेश भेजने वाला ) है झाबुआ की आम जनता, संदेश है कलेक्टर कार्यालय के पीछे बनी दीवार, और रिसीवर (संदेश प्राप्तकर्ता) हैं  कलेक्टर अरूणा गुप्ता और जिला पंचायत सीईओ अनुराग चौधरी जी । 

कलेक्टर कार्यालय के पीछे बनी दीवार एक दो नहीं हजारों लोगों को परेशान कर रही है, बारिश के दिनों में यहां से निकलना और भी घातक हो चुका है । 2 जून को झाबुआ के आम आदमी ने सीईओ सा. को मैसेज किया कि दीवार के कारण दोनों तरफ दिखाई नहीं देता कि कौन सा वाहन आ रहा है, इससे कई बार दुर्घटना का अंदेशा रहता है तो कई बार विवाद की स्थिति बन जाती है । लोग उसी से  गुहार लगाते हैं जहां उम्मीद होती है, हर चौखट पर सर पटकने से अच्छा है कि जहां देवता जल्दी प्रसन्न हो जाए वहीं अर्जी लगा दो । अर्जी पहुंची सीईओ साहब के पास लेकिन वो दिन और आज का दिन अब तक साहब का कोई रिप्लाय नहीं आया । ऐसा भी नहीं है कि साहब सोशल मीडिया पर एक्टिव नहीं है, मौजूदा प्रशासनिक अधिकारियों में से साहब ही सबसे ज्यादा एक्टिव हैं ।

साहब ने आम आदमी का मैसेज पढ़ा भी, हम इसलिए कह सकते हैं कि मैसेज के नीचे लिखा हुआ आ रहा है seen । तो संचार के बाधित होने की कोई वजह नहीं थी, मैसेज पहुंच गया था । साहब का कोई मैसेज नहीं आया ।  फिर आम आदमी इस बात से दुखी है कि दीवार को छोटा करना, गिराना तो दूर साहब ने इस जन समस्या पर रिप्लाय भी करना उचित नहीं समझा ।

साहब कि दुविधा भी है कि दीवार खड़ी की कलेक्टर साहब ने, तो वो कैसे गिरा दें । लेकिन इस एक दीवार से कई लोगों को परेशानी हो रही है, गिरा दीजिए इस दीवार को । दावे के साथ कह सकता हूं कि ये किसी विज्ञापन वाली दमदार सीमेंट से नहीं बनी होगी । इसलिए आसानी से गिराई जा सकती है ।  लोग ये भी सोचते हैं कि जो बनाना चाहिए वो तो अधूरा पड़ा है, चाहे वो उत्कृष्ट सड़क हो, एनएच 59 हो । लेकिन जो लोगों के लिए सुविधाजनक था आपने उसी पर बाधा खड़ी कर दी है । झाबुआ की जनता चाहती है कि वो दीवार गिर जाए, दीवार गिरेगी तो ये प्रशासन की हार नहीं बल्कि जीत होगी , क्योंकि ऐसा करके प्रशासन जनता के दिल को जीत सकता है । जनता की भावनाओं के उलट कोई भी खड़ा नहीं हो सकता है, ना  नेता, ना अधिकारी ।

संचार का एक ये भी माध्यम है शायद जिम्मेदारों तक हमारी बात पहुंचे, और फीडबैक के रूप में कलेक्टर कार्यालय के पीछे की दीवार गिरी हुई मिले, वरना ये ही समझा जाएगा कि या  तो तकनीकी बाधा है या फिर जिम्मेदारों का अहम जनता की भावनाओं से ज्यादा बड़ा है ।

 

 

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Categories: झाबुआ, प्रदेश, राजनीति, jhabua

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