झोपड़ी को तोड़कर आज़ाद स्मृति मंदिर नहीं आपने तो जेलखाना बना दिया सरकार !

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शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की जन्मस्थली भाबरा, जहां उनका जन्म हुआ, जहां के जंगलों में तीर-कमान चलाते-चलाते कब तमांचा चलाना सीख गए शायद कोई नहीं जानता । ताउम्र ये कहने वाले आज़ाद हूं आज़ाद रहूंगा । और सच भी है कि जीते जी तो अंग्रेज उन्हें छू भी नहीं पाए । मौत भी आई तो उनकी अनुमति से और कहा कि आप मेरा वरण कीजिए, मैं आपका वरण करने लायक नहीं हूं । ऐसे आज़ाद जो हमेशा आज़ाद रहे ।

आज़ाद की जन्मस्थली को लेकर सियासत भी खूब हुई, भाबरा का नाम परिवर्तन से लेकर उनकी यादों को सहजने तक । 9 अगस्त को पीएम मोदी कार्यक्रम में कई लोगों को भाबरा में आज़ाद की जन्मस्थली देखी होगी ।

सोचिए जिस शख्स ने ताउम्र आज़ाद रहने का प्रण लिया था, जो जीते जी कायम भी रहा, लेकिन सरकारों ने एक दीवार का ढांचा खड़ा कर आज़ाद की प्रतिमा ताले में कैद कर दी । भाबरा में शायद यही होता है, जब हल्ला होता है तो आज़ाद दूर से देख लेते हैं,क्योंकि तब कपाट खुल जाते हैं,  भीड़ के गुजरते ही इस स्मृति मंदिर में वे और उनका अकेलापन होता है , वो भी कैद में । ना बाहर से कोई अंदर देखने वाला और ना ही अंदर से कोई बाहर देखने वाला । इस अपराध की क्या सजा होगी ।

और मुझे ऐसा लगता है कि मेरी तरह कई लोगों को ये स्मृति मंदिर रास नहीं आया होगा । बताईये भला,  सीमेंट-कांक्रीट का ऐसा भव्य स्मारक तो देश में कही भी बनाया जा सकता था, तो फिर भाबरा में क्या हो सकता था । भाबरा में उस कुटिया को सहज कर रख लिया जाता तो कितना अच्छा होता, उस आम के पेड़ पर ध्यान दे दिया जाता, कुटिया के पीछे बने बाड़े को सहेज लिया जाता, आज़ाद ने जिस परिवेश में जिस वातावरण में इस घर में बचपन गुजारा, अगर वो वैसा ही बचा लिया जाता तो कितना सुखद होता ।

लेकिन सरकार ने लाखों खर्च कर स्मृति मंदिर बनवाया है, सच पूछिए तो आज़ाद की आत्मा भी रोती होगी, इस सीमेंट-क्रांकीट के मंदिर में । इस पर भी ये अपराध की लोगों के जाने के बाद कार्यक्रम खत्म होने के बाद आज़ाद को ताले में रहना पड़ता है ।

आप का ये स्मृति मंदिर किसी का काम नहीं है, लोग जुड़ ही नहीं पाते हैं इस मंदिर के साथ, सिवाय इसके की आज़ाद की आदमकद प्रतिमा । अगर वो कुटिया होती, वो आम होता, वो आंगन होता, वो खटिया होती तो सोचिए कितना अपनापन सा लगता ।लोग आज़ाद को इन चीजों को छूकर महसूस करते ।  आप की इन पक्की दीवारों में वो सुकून कहां जो उस मिट्टी, कवेलू, बांस की झोपड़ी में था । आपने सजावट तो की लेकिन आज़ाद की आज़ादी छीन ली, उनका स्वाभिमान छीन लिया । अब इतनी गुजारिश है कि जो गलती हो गई उसे सुधारा नहीं जा सकता , क्योंकि कुटिया के अवशेष कहां है, किसे पता, आम का पेड़ अब खत्म हो चुका है, बस कुछ कवेलू और बांस की बल्लियां हैं । लेकिन हो सके तो आज़ाद को आज़ाद रहने दीजिए, ताले कैद करके रखने से भला क्या होगा, कुछ ऐसा कीजिए की इस आज़ाद कुटिया जो आपने स्मृति मंदिर बदल डाली है, इसके कपाट कभी बंद ना हो ।  बाकी तो जो है सो है ही ।

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