राष्ट्रीय पक्षी मोर – दिल ना मांगे MORE, इसलिए उजड़ा मयूर पार्क,अब बसाएगा कौन ?

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मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी जिसकी सुंदरता देख कोई भी इंसान बरबस ही उसकी और आकर्षित हो जाता है । लेकिन जिले के रायपुरिया में कुछ लोगों को मोर की सुंदरता से ऐसी नफरत हुई की उसके आशियाने को उजाड़ने में कोई कसर नही रखी ।  रायपुरिया में बने मयूर पार्क में मोरों के स्वागत के लिए हमेशा तैयार खड़े रहने वाले हर भरे पेड़ों को काट दिया गया । जो मयूर पार्क मोरों का आश्रयस्थल था, आज वहां केवल ठुठ खड़े हैं । मोरों की संख्या को लेकर व्यापक मतभेद हैं, कोई 100 कहता है, कोई 150 तो कोई 200 , लेकिन मोर अगर एक भी हो तो उसकी खूबसूरती को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता  । ऐसे ही मोरों के नशेमन पर बिजलियां गिराई कुछ घोर सुंदरता विरोधी ताकतों ने । मयूर पार्क के इन वृक्षों को काट दिया गया । अब ठूठ है, जैसे कह रहे हो कि मोरों को पनाह देने की इतनी भयानक सज़ा क्यों  ? मोरों का दर्द क्या होगा, अभी पता नहीं चल पाया है क्योंकि जब से पेड़ कटे हैं उनका इधर आना जरा कम सा हो गया है । एक उन्हीं के पास सच्ची गवाही है कि पेड़ किसने काटे हैं , लेकिन विज्ञान अभी उस कामयाबी की तलाश में है जब पक्षियों, खासकर मोरों की बोली को समझा जा  सकेगा ।

 मामले में ग्राम पंचायत खुद शिकायतकर्ता है ।  लेकिन पेड़ किसने काटे इसका जवाब किसी के पास नहीं है । या यूं कहे कि जो जानते हैं वो भी खामोश हैं । हम जब रायपुरिया पहुंचे तो कई लोग सफाई देने भी पहुंचे कि जिन्होंने काटे वो तो इस मयूर पार्क में नए सिरे से पौधे लगाना चाहते हैं । क्यों भाई जब आपको नए पौधे लगाने थे ही तो लगाकर उन्हें बड़े कर लेते फिर इन पेड़ों को काट लेते, हमारे राष्ट्रीय पक्षी को नाहक ही बेघर कर दिया ।

रायपुरिया ग्राम पंचायत के सरपंच सुखराम के मुताबिक पहले भी इस जमीन पर लोगों की नज़र थी और उन्होंने ही साल 2005-06 में इसे मयूर पार्क में तब्दील कर मोरों को आश्रय दिया था । सुखराम के मुताबिक ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई होना चाहिए ।

दूसरी और आपको जानकर हैरत होगी कि मोरों को लेकर वनविभाग के पास कोई योजना नही है, कम से कम पेटलावद वन विभाग अनुभाग के अधिकारियों का तो यही कहना है । इस मामले में वनविभाग का कहना है कि पार्क राजस्व की ज़मीन पर है इसलिए वे इसमें दखल नहीं दे सकते  ।

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पेटलावद वनविभाग के कार्यालय के बाहर लगा एक होर्डिंग, हालांकि इसमें ये स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन सा मामला उनके दखल देने लायक होगा और कौन सा नहीं । और किस मामले में वो पंचनामा बनाने जा सकते हैं, और किस मामले में वो पंचनामा नहीं बना सकते । एक बात ये भी है कि जब इस होर्डिंग के रंगरोगन के लिए विभाग के पास समय और बजट नहीं है तो वास्तव में मोरों के संरक्षण के लिए विभाग की जिम्मेदारी समझी जा सकती है । 

लेकिन कमाल ये भी है कि दखल लायक नहीं होने के बावजूद वनविभाग का अमला मौके पर पहुंचा पंचनामा बनाया लेकिन पंचनामे के वक्त शिकायकर्ता को नहीं बुलाया । क्यों नहीं बुलाया इसका कोई जवाब नहीं है ।

हालांकि जब आप पेटलावद में वनविभाग के कार्यालय पहुंचेगे तो बाहर एक होर्डिंग लगा मिलेगा ।  हालांकि इसमें ये स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन सा मामला उनके दखल देने लायक होगा और कौन सा नहीं । और किस मामले में वो पंचनामा बनाने जा सकते हैं, और किस मामले में वो पंचनामा नहीं बना सकते । एक बात ये भी है कि जब इस होर्डिंग के रंगरोगन के लिए विभाग के पास समय और बजट नहीं है तो वास्तव में मोरों के संरक्षण के लिए विभाग की जिम्मेदारी समझी जा सकती है । ऐसा हम इस सालों पूराने होर्डिंग की हालत देखकर कह सकते हैं और हमारे पाठक समझ सकते हैं । 

 मामले में पेटलावद एसडीएम हर्षल पंचोली गंभीर हैं लेकिन परेशानी ये कि कोई सुराग कोई सबूत नहीं मिल पा रहा कि आखिर पेड़ किसने काटे ? हालांकि पेटलावद वनविभाग के अधिकारी की माने तो काटने वाले ये पड़े काटकर आम-जाम के पौधे लगाकर बगीचे को सुंदर बनाना चाहते थे । अब अगर उनके पास इतनी जानकारी है तो वे राजस्व विभाग को बताने से क्यों चूक रहे हैं कि वे कौन लोग हैं जो मयूर के आशियाने को उजाड़कर फलदार बगीचा बनाना चाहते थे । नेक काम करने वालों का सम्मान होना चाहिए ।

हमारे सूत्र बताते हैं कि मामले में रसूखदार और राजनीति से जुड़े लोगों का दखल है, तो राष्ट्रीय पक्षी मोर क्या, राष्ट्रीय पशु का भी मामला होता तो दबा दिया जाता । लेकिन जो खामोश है उन्हें अपने जमीर की आवाज पर आकर दोषियों के नाम उजागर करना चाहिए । हो तो ये भी सकता है कि जैसे एक गुमनाम चिट्ठी ने बाबा राम रहीम को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया, रायपुरियावासी भी भगवान कार्तिक के वाहन मोर के आश्रय को उजाड़ने वालों के नाम एसडीएम तक पहुंचा दें, ऐसे भी वे मोर संरक्षण में अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं ।

मामला में पूरा सप्ताह बीत गया लेकिन कार्रवाई नहीं है, उससे भी बड़ा सवाल कि फिर से मयूर पार्क तक मोरों को कैसे लाया जाए, अब क्या किया जाए कि फिर मोर मयूर पार्क की शोभा बढ़ाएं । वनविभाग करेगा नहीं क्योंकि उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, जैसा कि अधिकारी बताते हैं । तो ग्राम पंचायत और ग्रामवासियों को ही आगे आकर फिर मयूर पार्क को बसाना होगा ।

बाकी तो जो है सो है ही ।

udan

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Categories: झाबुआ

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