मैं मीडिया हूं- लाखों की उम्मीदों का सहारा हूं, और कुछ की आंख का कांटा हूं !

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 जनसुनवाई- हर मंगलवार को एक रूटीन सा काम, इस जनसुनवाई में कितनी ही उम्मीदों को टूटते देखा, आस छूटते देखा है, उम्मीदों की गठरी और दर्द-पीड़ा का बोझा लिए कोई जिले के इस कोने से आता है तो कोई उस कोने से । पर जिला मुख्यालय पर ये उम्मीदों की गठरी या तो आश्वासन से जल जाती है या अनदेखी से भस्म हो जाती है ।  

इंसाफ के लिए इंसान कहां  गुहार लगाए, गांव में नहीं सुने तो कस्बे में जाओ कस्बे में नहीं सुने तो शहर जाओ, शहर वाले ही कान में रूई डालकर बैठ जाए तो फिर क्या करोगे । फिर मेरे जिले की जनता की गठरी का बोझ आता है मीडिया के सर । पर मीडिया ये दर्द और उम्मीद अपने सर पर ले ले तो जिम्मेदारों को गुस्सा आ जाता है ।

क्यों जन की बात करते हो

क्यों मदद की बात करते हो

अच्छा तो तुम खूब दिखाओ एतराज नहीं

पर हमारी कमियों की क्यों बात करते हो ।

 ऐसा आज हुआ झाबुआ में होने वाली जनसुनवाई में ।  कलेक्टर कार्यालय परिसर में फरियादी और आरोपी आमने सामने हो गए । थप्पड़-मुक्के चले । आरोपी इस बात से गुस्सा था कि फरियादी उसकी शिकायत लेकर जनसुनवाई में क्यों आए । 10 मिनट तक हंगामा होता रहा । फरियादी महिलाओं के साथ मारपीट की गई,  उसके बाद महिलाओं के परिजन भी पहुंचे और दोनों पक्षों भिड़ गए । पूरी घटना को आप वीडियो  में देख सकते हैं ।

अब आपको इस घटना के बैकग्राउंड में ले चलते हैं । 27 दिंसबर को नौगांवा में दो लोगों की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी ।  जो उमरदा के रहने वाले थे, नाम दिनेश और कसन । घटना के बाद परिजनों ने वाहन को जब्त करने और वाहन मालिक, चालक के खिलाफ कार्रवाई करने की शिकायत की थी । घटना के 20 दिन बाद और पुलिस के मुताबिक रिपोर्ट मिलने के 10 दिन बाद भी ना ट्रैक्टर पुलिस के पास है और ना उसका मालिक । पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू की । पुलिस रिपोर्ट में ट्रैक्टर का क्रमांक एमपी 45 एए 6351 का दर्शाया गया, लेकिन नाम और पता को पुलिस को नामालूम है जी  । इस नामलूम को मालूम करने के लिए भी एक वीडियो लिंक है साथ में ,  जिससे पुलिस मालूम कर सकती है, कि वो कौन है जिसे वो बचाने का प्रयास कर रही है ।

इस मामले की जांच और ठोस कार्रवाई के लिए दिनेश और कसन के परिजन जनसुनवाई में पहुंचे, जहां से एसपी ऑफिस जाने की सलाह दी गई । फरियादी एसपी कार्यालय पहुंचे, उनके साथ मीडिया भी पहुंचा, लेकिन झाबुआ एसपी को ये नागवार गुजरा, मीडियाकर्मियों से कह दिया कि मेरे ऑफिस में फोटो वीडियो लेने की जरूरत नहीं है ।

मामला ये है कि ऐसे मसलों पर मीडिया बुरा क्यों लगता है, क्या मीडिया को शासन की ओर से  नियुक्त जबावदार और जवाबदेह माननीयों से ये पूछने का अधिकार नहीं है कि मामला यहां तक क्यों पहुंचा, क्यों अब तक ट्रैक्टर जब्त नहीं हुआ । क्यों अब तक ट्रैक्टर मालिक के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई । क्यों पुलिस रिपोर्ट में ट्रैक्टर क्रमांक तो दर्ज है लेकिन नाम- पता मालूम नहीं हो सका । अगर समय रहते ही सारी जिम्मेदारियां पूरी कर ली जाती तो आज फरियादी को जिला मुख्यालय पर आने की जरूरत ही नहीं पड़ती ।

बचाव में पुलिस विभाग कहता है कि बैर मूल्य यानी कि झगड़े के लिए हो रहा है । सही है कि जिले में ये कुरीति जोरों पर है, तो आप क्यों कि इस कुरीति को बढ़ा रहे है , क्यों पुलिस दोषियों और बैर मूल्य मांगने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करती । भांजगढ़ी में क्यों पुलिस सहयोगी की भूमिका में आ जाती है, क्योंकि भांजगड़ी से होने वाले फायदे की समझ है । ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होना चाहिए, साथ ही बैर मूल्य वालों को भी सबक सीखाया जाना चाहिए, ताकि बैर मूल्य प्रथा का जिले से उन्मूलन हो सके ।

उम्मीद है कि मीडिया को उसके काम को करने की आज़ादी मिलेगी, पुलिस उसके जिम्मे के काम बखूबी निभाएगी । मीडिया केवल पीआरओ बनकर खबरें दिखाने के लिए नहीं है, जहां सिस्टम कमजोर दिखाई देगा, उसको उजागर भी करेगी । यही उसका कर्तव्य है । फिर कोई बुरा माने या भला कहें, मीडिया को तो उसकी जिम्मेदारी निभानी है, जहां उम्मीदें दम तोड़ेंगी वहां मीडिया होगा । क्योंकि 

मेरा वजूद क्या बस एक तिनका ही तो हूं,बहुत छोटा हूं

पर लाखों की उम्मीदों का सहारा हूं, औऱ कुछ की आंख का कांटा हूं

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