महफिल-क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन ।

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दोस्तों महफिल में आपका स्वागत है,हमारे इस कॉलम आप गीत, कविता, गज़ल, नज्म और शायरी से रूबरू होंगे ।

आज जन्माष्टमी है, इस मौके पर नजीर अकबराबादी की ये नज़्म खासतौर पर पेश हैं । नजीर उर्दु में नज्म लिखने वाले पहले कवि माने जाते हैं । नजीर ने इस नज्म में कन्हैया के बालपन को जिस खुबसूरती के साथ पेश किया है, उसका लुत्फ आप भी उठाईये ।

यारो सुनो! यह दधि के लुटैया का बालपन।
और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन॥
मोहन सरूप निरत करैया का बालपन।
बन-बन के ग्वाल गोएँ चरैया का बालपन॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥1॥

ज़ाहिर में सुत वह नन्द जसोदा के आप थे।
वर्ना वह आप माई थे और आप बाप थे॥
पर्दे में बालपन के यह उनके मिलाप थे।
जोती सरूप कहिये जिन्हें सो वह आप थे॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥2॥

उनको तो बालपन से न था काम कुछ ज़रा।
संसार की जो रीति थी उसको रखा बजा॥
मालिक थे वह तो आपी उन्हें बालपन से क्या।
वां बालपन, जवानी, बुढ़ापा, सब एक था॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥3॥

मालिक जो होवे उसको सभी ठाठ यां सरे।
चाहे वह नंगे पांव फिरे या मुकुट धरे॥
सब रूप हैं उसी के वह जो चाहे सो करे।
चाहे जवां हो, चाहे लड़कपन से मन हरे॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥4॥

बाले हो व्रज राज जो दुनियां में आ गए।
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गए॥
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गए।
इक यह भी लहर थी कि जहां को जता गए॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥5॥

यूं बालपन तो होता है हर तिफ़्ल[1] का भला।
पर उनके बालपन में तो कुछ और भेद था॥
इस भेद की भला जी, किसी को ख़बर है क्या।
क्या जाने अपने खेलने आये थे क्या कला॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥6॥

राधारमन तो यारो अ़जब जायेगौर[2] थे।
लड़कों में वह कहां है, जो कुछ उनमें तौर थे॥
आप ही वह प्रभू नाथ थे आप ही वह दौर थे।
उनके तो बालपन ही में तेवर कुछ और थे॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥7॥

वह बालपन में देखते जीधर नज़र उठा।
पत्थर भी एक बार तो बन जाता मोम सा॥
उस रूप को ज्ञानी कोई देखता जो आ।
दंडवत ही वह करता था माथा झुका झुका॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥8॥

पर्दा न बालपन का वह करते अगर ज़रा।
क्या ताब थी जो कोई नज़र भर के देखता॥
झाड़ और पहाड़ देते सभी अपना सर झुका।
पर कौन जानता था जो कुछ उनका भेद था॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥9॥

मोहन, मदन, गोपाल, हरी बंस, मन हरन।
बलिहारी उनके नाम पै मेरा यह तन बदन॥
गिरधारी, नन्दलाल, हरि नाथ, गोवरधन।
लाखों किये बनाव, हज़ारों किये जतन॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥10॥

पैदा तो मधु पुरी में हुए श्याम जी मुरार।
गोकुल में आके नन्छ के घर में लिया क़रार[3]
नन्द उनको देख होवे था जी जान से निसार[4]
माई जसोदा पीती थी पानी को वार वार॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥11॥

जब तक कि दूध पीते रहे ग्वाल व्रज राज।
सबके गले के कठुले थे और सबके सर के ताज॥
सुन्दर जो नारियां थीं वह करतीं थी कामो-काज।
रसिया का उन दिनों तो अजब रस का था मिज़ाज॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥12॥

बदशक्ल से तो रोके सदा दूर हटते थे।
और खु़बरू को देखके हंस-हंस चिमटते थे॥
जिन नारियों से उनके ग़मो-दर्द बंटते थे।
उनके तो दौड़-दौड़ गले से लिपटते थे॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥13॥

अब घुटनियों का उनके मैं चलना बयां करूं।
या मीठी बातें मुंह से निकलना बयां करूं॥
या बालकों की तरह से पलना बयां करूं।
या गोदियों में उनका मचलना बयां करूं॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥14॥

पाटी पकड़के चलने लगे जब मदन गोपाल।
धरती तमाम हो गई एक आन में निहाल[5]
बासुक चरन छूने को चले छोड़ कर पताल।
आकास पर भी धूम मची देख उनकी चाल॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥15॥

थी उनकी चाल की तो अ़जब यारो चाल-ढाल।
पांवों में घुंघरू बाजते, सर पर झंडूले बाल॥
चलते ठुमक-ठुमक के जो वह डगमगाती चाल।
थांबें कभी जसोदा कभी नन्द लें संभाल॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥16॥

पहने झगा गले में जो वह दखिनी चीर का।
गहने में भर रहा गोया लड़का अमीर का॥
जाता था होश देख के शाहो वज़ीर का।
मैं किस तरह कहूं इसे छोरा अहीर का॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥17॥

जब पांवों चलने लागे बिहारी न किशोर।
माखन उचक्के ठहरे, मलाई दही के चोर॥
मुंह हाथ दूध से भरे कपड़े भी शोर-बोर।
डाला तमाम ब्रज की गलियों में अपना शोर॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥18॥

करने लगे यह धूम, जो गिरधारी नन्द लाल।
इक आप और दूसरे साथ उनके ग्वाल बाल॥
माखन दही चुराने लगे सबके देख भाल।
दी अपनी दधि की चोरी की घर घर में धूम डाल॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥19॥

थे घर जो ग्वालिनों के लगे घर से जा-बजा।
जिस घर को ख़ाली देखा उसी घर में जा फिरा॥
माखन मलाई, दूध, जो पाया सो खा लिया।
कुछ खाया, कुछ ख़राब किया, कुछ गिरा दिया॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥20॥

कोठी में होवे फिर तो उसी को ढंढोरना।
गोली में हो तो उसमें भी जा मुंह को बोरना॥
ऊंचा हो तो भी कांधे पै चढ़ कर न छोड़ना।
पहुंा न हाथ तो उसे मुरली से फोड़ना॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥21॥

गर चोरी करते आ गई ग्वालिन कोई वहां।
और उसने आ पकड़ लिया तो उससे बोले हां॥
मैं तो तेरे दही की उड़ाता था मक्खियां।
खाता नहीं मैं उसकी निकाले था चूंटियां॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥22॥

गर मारने को हाथ उठाती कोई ज़रा।
तो उसकी अंगिया फाड़ते घूसे लगा लगा॥
चिल्लाते गाली देते, मचल जाते जा बजा।
हर तरह वां से भाग निकलते उड़ा छुड़ा॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥23॥

गुस्से में कोई हाथ पकड़ती जो आन कर।
तो उसको वह सरूप दिखाते थे मुरलीधर॥
जो आपी लाके धरती वह माखन कटोरी भर।
गुस्सा वह उनका आन में जाता वहीं उतर॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥24॥

उनको तो देख ग्वालिनें जी जान पाती थीं।
घर में इसी बहाने से उनको बुलाती थीं॥
ज़ाहिर में उनके हाथ से वह गुल मचाती थीं।
पर्दे में सब वह किशन के बलिहारी जाती थीं॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥25॥

कहतीं थीं दिल में दूध जो अब हम छिपाऐंगे।
श्रीकृष्ण इसी बहाने हमें मुंह दिखाऐंगे॥
और जो हमारे घर में यह माखन न पाऐंगे।
तो उनको क्या ग़रज है यह काहे को आऐंगे॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥26॥

सब मिल जसोदा पास यह कहती थी आके बीर।
अब तो तुम्हारा कान्ह हुआ है बड़ा शरीर॥
देता है हमको गालियां फिर फाड़ता है चीर।
छोड़े दही न दूध, न माखन, मही न खीर॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥27॥

माता जसोदा उनकी बहुत करती मिनतियां।
और कान्ह को डराती उठा बन की सांटियां॥
जब कान्ह जी जसोदा से करते यही बयां।
तुम सच न जानो माता, यह सारी हैं झूटियां॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥28॥

माता कभी यह मेरी छुंगलिया छुपाती हैं।
जाता हूं राह में तो मुझे छेड़ जाती हैं॥
आप ही मुझे रुठाती हैं आपी मनाती हैं।
मारो इन्हें यह मुझको बहुत सा सताती हैं॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥29॥

माता कभी यह मुझको पकड़ कर ले जाती हैं।
गाने में अपने सथ मुझे भी गवाती हैं॥
सब नाचती हैं आप मुझे भी नचाती हैं।
आप ही तुम्हारे पास यह फ़रयादी[6] आती हैं॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥30॥

एक रोज मुंह में कान्ह ने माखन झुका दिया।
पूछा जसोदा ने तो वहीं मुंह बना दिया॥
मुंह खोल तीन लोक का आलम दिखा दिया।
एक आन में दिखा दिया और फिर भुला दिया॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥31॥

थे कान्ह जी तो नंद जसोदा के घर के माह।
मोहन नवल किशोर की थी सबके दिल में चाह॥
उनको जो देखता था सो कहता था वाह-वाह।
ऐसा तो बालपन न हुआ है किसी का आह॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥32॥

सब मिलके यारो किशन मुरारी की बोलो जै।
गोबिन्द छैल कुंज बिहारी की बोलो जै॥
दधिचोर गोपी नाथ, बिहारी की बोलो जै।
तुम भी ”नज़ीर“ किशन बिहारी की बोलो जै॥
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन॥33॥

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आकर्षक गरबा सीखना है तो झाबुआ में हो रहा है ये आयोजन ।

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झाबुआ पोस्ट ।
 13 अक्टूबर से नवरात्रि शुरू होने जा रही है । पूरे जिले भर में घट स्थापना के बाद गरबों की धूम रहेगी । नवरात्रि महोत्सव को लेकर अगल-अलग आयोजन समितियों की तैयारियां जोरों पर है । नवरात्रि में मुख्य आकर्षण होता है गरबा । हर किसी की चाहत होती है कि वो अलग शैली में गरबा प्रस्तुत कर आकर्षण का केन्द्र बने ।  कई आयोजक आकर्षक और श्रेष्ठ गरबा करने वालों को पुरूस्कृत भी करते हैं । नवरात्रि महोत्सव को देखते हुए शहर में गरबा वर्कशॉप का आयोजन होने जा रहा है । शहर के मशहूर डांसर और कोरियोग्राफर आशीष पांडे इस वर्कशॉप में  आने वालों को स्टाइलिश गरबा प्रशिक्षण देंगे । खास बात ये हैं कि ये वर्कशॉप सिर्फ लड़कियों और महिलाओं के लिए हैं । कोरियोग्राफर आशीष का कहना है कि कई लोगों में हिचक होती है, शर्म के कारण मन होने के बावजूद वे गरबा नहीं करते, क्योंकि वे सोचते हैं कि अगर ठीक से गरबा नहीं कर पाए तो मजाक के पात्र ना बन जाए । । आशीष के मुताबिक ये वर्कशॉप गरबों के पहले ऐसे लोगों का डर और झिझक दोनों खत्म करेगा । साथ ही वर्कशॉप में आने वालों को अलग- अलग और आकर्षक शैलियों में गरबा सीखने को मिलेगा । इस वर्कशॉप का आयोजन 5 अकूटबर से 11 नवबंर तक एकलव्य सांस्कृतिक भवन, थांदला गेट पर किया जा रहा है  ।

पंचम तुम बहुत याद आते हो !

pancham0127 जून को पंचम दा यानी कि राहुल देव बर्मन का जन्मदिन है….कोई माने या ना माने लेकिन फिल्मी दुनिया के सौ साल के इतिहास में ऐसा संगीतकार एक बिरला ही है…..सर्वश्रेष्ठ है….बेमिसाल है….सबसे बेहतरीन है…..और वो पंचम दा हैं…..100 गीतों की सूची बनाईये जिन्हें आप गुनगुनाते रहते हो…..जब दिल खुश हो तब कौन सा गीत यादा आता है…..मस्ती चढ़ती है तब कौन सा गीत याद आता है……दिल को जब ठेस लगती है तब कौन सा गीत याद आता है……लोरी सुनानी हो तब क्या याद आता है…..भक्ति रस में डूबना हो तो क्या याद आता है…..दोस्ती जतानी हो……रूठी हुई प्रेयसी को मनाना हो…..किसी को याद करना हो…..
जीवन के सारे रस और प्रसंग ले लीजिए…….आपकी जबान पर पंचम दा की धूनें जरूर आएंगी…….पंचम दा ने पुराना भी बखूबी संजोकर रखा….और नया भी दिल खोल कर अपनाया….लेकिन दोनों का फर्क नहीं मिटने दिया……इसीलिए पंचम दा सबसे बेहतर हैं…..स्केल चैंज करने का हूनर तो आज भी आप ए आर रहमान और शंकर एहसान लॉय के गीतों में देख सकते हैं…..आज भी जब ट्रंपपेड बजता है….तो वो पंचम दा की फिल्मों का ही होता है….दारू की बोतल और कांच के ग्लास से मधूर संगीत अब नहीं निकलता…..अब कंघी से भी इफेक्ट नहीं निकलता……गिटार बजाने वाले बहुत हैं….लेकिन जो प्रयोग पंचम दा के हैं वैसे अब सुनने को नहीं मिलते हैं……गिटार बजाने वाले भी अपना अभ्यास पंचम दा की गिटार धूनों से करते हैं……माउथ आर्गन का प्रयोग अब आपको नहीं मिलेगा….माउथ आर्गन पंचम दा को सबसे ज्याद पसंद INSTRUMENT था…..फिल्म दोस्ती (1963 ) में लक्ष्मीलाल-प्यारेलाल के कहने पर फिल्म में पंचम ने माउथ आर्गन बजाया और क्या खूब बजाया….शोले फिल्म का अमिताभ वाला पीस…..औऱ कितने ही गीत ले लीजिए……pancham da
पंचम तुम हमारे बीच नहीं हो……पर वो गीत हैं…वो संगीत हैं….जो तुमने इस दुनिया को दिया है.. वो हमारे दिल को छू जाता है..तुम्हारे पहले कई लोग थे…तुम्हारे बाद भी कई संगीतकार आए…..लेकिन तुम्हारी कमी पूरी करने वाला कोई नहीं….कोई हो भी नहीं सकता है…क्योंकि तुम एकलौते थे अपने फन माहिर……..और ऐसा कलाकार सदी में एक ही बार आता है…….
इसलिए आज भी तुम बहुत याद आते हो….

पंचम

 

झाबुआ के कलाकारों ने इंडियास् गोट टैंलेट में दी प्रस्तुति ।

362328-india-got-talent-6.jpgसाज़ रंग के दो युवा कलाकारों ने कलर्स पर प्रसारित होने वाले इंडियास् गोट टैंलेट के मंच पर रविवार रात को नज़र आए । दोनों युवा कलाकार हिमांशु भूरिया और महावीर परमार पिछले 3 सालों से संस्था के नृत्य प्रशिक्षक आशीष पांडे से डांस की विभिन्न शैलियां सीख रहे हैं । रविवार को इन दोनों युवाओं ने इंदौर के डांस ग्रूप के साथ अपनी प्रस्तुति दी । इस डांस का ग्रूप का नाम कथक बॉयस है । कथक बॉयस ग्रूप के बलवीर सिंह ने आशीष से संपर्क कर दोनों कलाकारों को इंदौर बुलवाया था । जहां से पूरी टीम ने मुबंई में इंडियास गोट टैंलेट के मंच अपनी धमाकेदार प्रस्तुति से सभी का दिल जीत लिया । शो की जज और मशहूर अभिनेत्री किरण खेर खुद को रोक नही पाई और ग्रूप के साथ डांस करने मंच पर जा पहुंची । indias copy पूरे टीम में 50 लोग शामिल थे ।  इस डांस ग्रूप का चयन राउंड के लिए हो चुका है । संस्था के कलाकारों की इस सफलता पर सभी अध्यक्ष धर्मेन्द्र मालवीय, शैलेन्द्र सिंह राठौर, भरत व्यास, प्रशिक्षक आशीष पांडे, दीपक दोहरे, विकास पांडे, वीरेन्द्र सिंह राठौर, प्रवेश उपाध्याय, वीरेन्द्र सिंह ठाकुर,ताहा अली, हर्षुल त्रिवेदी, आदित्य गुप्ता, राहुल बैरागी आदि ने बधाई दी ।

जो लड़े दीन के हेत, महानाट्य ने जीता लोगों का दिल, अभिनय के जरिये मुक्ताकाश मंच पर बिखेर 1857 की क्रांति के रंग ।

3झाबुआ में रंगकर्म की अलख जगाने वाली संस्था साज़ रंग ने महानाट्य जो लड़े दीन के हेत के मंचन के साथ ही एक नया इतिहास रच दिया । 1857 की क्रांति के नायक तात्या टोपे के जीवन पर आधारित इस नाटक में कलाकारों के अभिनय, वेशभूषा,रूपसज्जा , भव्य मंच और अदभुत ध्वनि और प्रकाश संयोजन और सबसे ऊपर भूषण भट्ट के निर्देशन और लेखन ने जेल बगीचे में मौजूद 1000 से ज्यादा लोगों को अचरज कौतुहल में डाल दिया कि ये रंग चमत्कार झाबुआ में झाबुआ के ही लोग कर रहे हैं । कई लोगों को तो नाटक खत्म होने के बाद भी विश्वास ही नहीं हुआ कि मंच पर अभिनय करने वाले कलाकार झाबुआ नगर के ही हैं ।  नाटक सभी पात्रों और कलाकारों की अतिथियों समेत लोगों ने जमकर तारीफ की । करीब 200 लोगों ने इस नाटक में एक साथ अपनी प्रस्तुति दी, जिनमें 26 बच्चे जिला विकलांग पुर्नवास केन्द्र के भी शामिल थे ।

002नाटक में तात्या टोपे की भूमिका निभाने वाले वीरेन्द्र सिहं ठाकुर, नारायण सिंह पिंडारी की भूमिका में भरत व्यास, बगाराम पंडित की भूमिका में आशीष पांडे, जनरल मीड की भूमिका धर्मेन्द्र मालवीय, बाजीराव पेशवा की भूमिका में वीरेन्द्र सिंह राठौर, केशव  की भूमिका में रघुवीर सिंह चौहान , राजा मानसिंह की भूमिका में हर्षुल त्रिवेदी को खूब सराहा गया ।  दिल्ली से आए कुमारदास और सप्तरथी मोहंता की लाईट डिजाईनिंग, कन्हैयाल लाल कैथवास की मंच आकल्पन और हर्ष दौंड और अनामिक सागर के नृत्य संयोजन की भी लोगों ने जमकर वाह-वाही की ।

5मंच पर तीसरी घंटी बजने के बाद ही अभिनेताओं ने ऐसा जलवा बिखेरा की 1 घंटे 20 मिनट तक दर्शक नाटक में पूरी तरह से रमे रहे । झाबुआ की आदिवासी लोक परंपरा में अनुरूप वेशभूषा में इस क्रांति गाथा को आगे बढ़ाने वाले सूत्रधारों को भी खूब सराहा गया । वहीं संगीत ,गीत और नृत्य ने भी लोगों का मन मोह लिया । खासकर होली वाले गीत पर लोग झूमने लगे । नाटक ने 1857 की क्रांति के समय अलग-अलग परिस्थियों को बखूबी उकेरा गया । ग्राम स्वराज का सपना संजोए तात्या की जीवन के कई किस्सों को जेल बगीचे के 200 साल पुराने बरगद के नीचे दी गई इस प्रस्तुति दी सभी दृश्यों को जीवंत बना दिया । नाटक का लेखन, संगीत और निर्देशन ख्यात रंगकर्मी भूषण भट्ट ने किया था । नाटक के मंचन के साथ ही एक माह से  चल रहे रंगक्रांति शिविर का समापन हो गया ।

4 शनिवार शाम जेलबगीचे में तैयार किए गए मुक्ताकाश मंच पर मंचित इस नाटक को लोगों का खूब प्रतिसाद मिला । नाटक के पहले अतिथि के रूप में पधारे झाबुआ विधायक शांतिलाल बिलवाल, कलेक्टर बी. चंद्रशेखर, एसपी कृष्णावेणी देसावतु, सीईओ जिला पंचायत धनराजू एस , ख्यात आर्ट डायरेक्टर जयंत देशमुख ने तात्य टोपे के तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया । नाटक के बाद रंगक्रांति शिविर में प्रशिक्षण देने वाले भूषण भट्ट, कन्हैयालाल कैथवास,कुमारदास टीएन,सप्तरथी मोहंता,हर्ष दौंड, विक्रम मोहन, नंदनसिंह, सुश्री अनामिका सागर, सुश्री पुनम अरोरा, आशीष पांडे आदि प्रशिक्षकों का अभिनंदन पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया । नाटक के बाद कलेक्टर बोरकर ने कहा कि ये प्रस्तुति अदभुत दी, मैं कुछ और ही सोच कर आया था लेकिन कलाकारों के उम्दा प्रदर्शन ने मेरा भ्रम तोड़ दिया ।

7कलेक्टर  ने झाबुआ आकर प्रशिक्षण देने वाले सभी प्रशिक्षकों का आभार माना और कहा कि आगे भी हमें इस तरह के आयोजन देखने को मिलेंगे । विधायक शांतिलाल बिलावल ने कलाकारों की प्रशंसा करते हुए कहा कि पूरी टीम की मेहनत रंग लाई है । कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए मंच से परे दीपक दोहरे, विकास पांडे, आदित्य गुप्ता,आकाश विश्वकर्मा,रविन्द्र सिंह झाला, विपिन अडबालकर आदि का भी सहयोग सराहनीय रहा । कार्यक्रम के अंत में संस्था की ओर से आभार धर्मेन्द्र मालवीय ने माना । कार्यक्रम का संचालन शरद शास्त्री ने किया ।6

नाटक मूषक पुराण का हुआ मंचन, बाल कलाकारों ने मोहा दर्शकों का मन । रंगक्रांति शिविर के प्रतिभागियों ने दी प्रस्तुति

saaz02झाबुआ पोस्ट । शनिवार को साज़रंग के रंगक्रांति शिविर के बाल कलाकारों ने नाटक मूषक पुराण का मंचन किया . मंचन के दौरान इन बाल कलाकारों ने अपने हुनर का ऐसा प्रदर्शन किया कि हर कोई बस देखता ही रह गया । 25 दिन के अल्प समय में कुशल प्रशिक्षकों और शिविर के निर्देशक भूषण भट्ट ने इन बच्चों को बेहतरीन अभिनेता बना दिया । नाटक मूषक पुराण राबर्ट ब्राउनिंग की कविता दा पाइड पाइपर ऑफ़ हम्लिन  पर आधारित है । नाटक का लेखन ख्यात रंगकर्मी स्व. बीवी कारंत ने लिखा है ।

saaz3नाटक एक संदेश देता है कि कभी किसी कोई वादा करो तो उसे निभाओ । मंच पर कलाकारों के अभिनय ने ऐसा समां बाधा कि मौजूद दर्शक तालियां बजाएं बिना ना रह सके । नाटक कई दृश्यों ने दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया । नाटक खत्म होने के बाद जिला पंचायत सीईओ धनराजू एस ने कहा कि इन बच्चों ने मंच पर  मैजिक क्रिएट कर दिया । इसके लिए साज़ रंग की पूरी टीम बधाई की पात्र है । सीईओ धनराजू ने कहा कि जिंदगी भी रंगमंच की तरह होती है, रिटेक का समय नहीं होता , लेकिन गलतियों से अगली बार के लिए हम सीख सकते हैं । आज बच्चों ने जिस तरह से लाइव प्रस्तुति दी, उससे जादू सा हो गया ।

saaz 01आप कोई भी भूमिका निभाओ सबसे ज्यादा जरूरी है, पहले खुद उस किरदार मेें रम जाओ, तभी आप दर्शकों का दिल जीत सकते हैं, और नाटक मूषक पुराण के कलाकारों ने इसे साबित करके दिखा दिया । जिंदगी भी रंगमंच की तरह होती है, कोई रिटेक नहीं । लेकिन गलतियों से सबक सीखने और सुधारने का मौका देती है । – धनराजू एस., सीईओ, जिला पंचायत झाबुआ

नाटक के साथ में रंगक्रांति शिविर के प्रतिभागियों ने तलवारबाजी, बुंदेलखंडी स्टिक फाइटिंग और डांस की प्रस्तुति भी दी । नृत्य निर्देशक विक्रम मोहन और आशीष पांडे द्वारा तैयार करवाए गए डांस ने सभी का मनमोह ले लिया । डांस के बीच और खत्म होने के बाद दर्शकों ने तालियों से जोरदार उत्साहवर्धन किया । saaz00कार्यक्रम में शिविर के प्रतिभागियों ने अपने अऩुभव भी लोगों को बताए  कि कैसे ये शिविर उनके व्यक्तिव विकास और आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद कर रहा है ।

18 अप्रैल को ही 1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे का बलिदान दिवस था । कार्यक्रम में मौजूद लोगों, कलाकारों , संस्था के सदस्यों ने तात्या टोप के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया । नाटक की लाइट डिजाईनिंग दिल्ली से आए कुमारदास और सप्तरथी मोहंता ने की । रूप सज्जा धर्मेन्द्र मालवीय, अंतिम मालवीय और पुनम अरोड़ा ने किया । कार्यक्रम का सफल संचालन वीरेन्द्र सिंह ठाकुर ने किया । नाटक मंचन के दौरान करीब 500 से ज्यादा लोग मौजूद थे । 25 अप्रैल को संस्था द्वारा महानाट्य जो लड़े दीन के हेत का मंचन किया जा रहा है ।

कला के महारथी दे रहे हैं प्रशिक्षण, रंगक्रांति शिविर में प्रतिभागी सीख रहे विभिन्न कलाएं,लड़किया सीख रही तलवारबाजी, लड़के सीख रहे हैं बुंदेलखंड का फाइटिंग डांस.

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साज़ रंग द्वारा आयोजित शिविर में छोटे-बड़े सभी मिलाकर 300 प्रतिभागी हैं ।

झाबुआपोस्ट ।  कला की सरिता इन दिनों नगर में बह रही है , सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था साज़ रंग के जरिये । यूं तो संस्था साज़ रंग हर साल रंगशिविर का आयोजन करती है । लेकिन इस बार इसे नया रूप और रंग दिया गया है । बाहर से आए विषय विशेषज्ञ झाबुआ के इन उभरते हुए कलाकारों नई कलाविधाओं से रूबरू करवा रहे हैं ।

kalari pettu ki class_nandan singh

पटना के नंदनसिंह केरल के पारंपरिक युद्धकौशल खेल “कलरी पेट्टू “का प्रशिक्षण देते हुए ।

हम से बहुत कम लोगों ने “कलरी पेट्टू” का नाम सुना होगा । लेकिन शिविर में भाग लेने वाले सभी कलाकार अब इसके बार में जानते हैं । पटना से विशेष तौर पर आए नंदनसिंह ने इन्हें इसका प्रशिक्षँण दिया है । “कलरी पेट्टू”  केरल का पारंपरिक युद्धकौशल नृत्य है । इसे सभी मार्शल आर्टस् की जननी कहा जाता है । नंदनसिंह ने खुद केरल जाकर इसका प्रशिक्षण लिया । नंदनसिंह के मुताबिक “कलरी पेट्टू”  को सीखने के लिए व्यवहारिक और शारीरिक अनुशानस बहुत जरूरी है । केरल की इस पारंपरिक कला के साथ-साथ शिविर में भाग लेने वाली लड़किया तलवारबाजी भी सीख रही हैं और आत्मरक्षा के लिए मार्शल भी ।

vikram mohan_contemparary dance with CWSN hostel

दिल्ली से आए विक्रम मोहन मूक-बधिर बच्चों के साथ ।

vikram mohan_contemparary dance with CWSN hostel0वहीं दिल्ली के विक्रम मोहन शिविर के प्रतिभागियों को एक अलग ही अंदाज में केरल के पारंपरिक युद्ध कौशल से दूर मार्डन डांस सीखा रहे हैं । विक्रम इसके लिए खास बाउल का उपयोग करते हैं । इस बाउल की खासियत ये ही कि इसके आसपास लड़की की स्टिक घुमाने से इसमें कंपन होता है और ध्वनि कंपन को दूर तक सुना जा सकता है । ये ध्वनि डांस सीखने वाले को लगभग सम्मोहित सा कर देती है । विक्रम मोहन दिल्ली के रहने वाले हैं और राष्ट्रीय नाट्य विद्याल में थियटिरिकल मुवमेंट को लेकर प्रशिक्षण देते हैं । विक्रम मोहन के कई स्टूटेंट्स डांस इंडिया, डांस-डांस जैसे रियलिटी शो में अपने जलवा बिखेर चुके हैं ।

harsh doundशिविर में हर्ष दौंड प्रतिभागियों को बुंदलेखंड का स्टिक फाइटिंग डांस सीखा रहे हैं । ये नृत्य बुंदलेखंड का प्रसिद्ध नृत्य है । इसके साथ ही हर्ष दौंड माइम एक्सपर्ट भी है । विकलांग केन्द्र के मूक-बधिर बच्चों के साथ वे इस पर काम करेंगे । हर्ष रंगमंच की दूनिया में कई नामचीन हस्तियों के साथ काम कर चुके हैं । हर्ष दौंड मुबंई में सुभाष घई के स्टूडियो विसलिंग वुड्स में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं  ।  साज़ रंग द्वारा आयोजिक रंगक्रांति शिविर 18 अप्रैल तक चलना है इस बीच कई और एक्सपर्ट इसमें शिरकत करेंगे ।

13 अप्रैल से पूनम अरोरा पॉवर योगा, एरोबिक्स और जुंबा डांस का प्रशिक्षण देंगी । यह प्रशिक्षण विशेष कर गृहिणियों और कामकाजी महिलाएं के लिए होगा । पूनम ने दिल्ली की एमिटी यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान का विशेष अध्ययन किया है । साथ में वे एक डायटिशियन भी हैं । वे संतुलित और सही भोजन के जरिये वेट लॉस एवं स्वास्थ्य परामर्श भी देंगी । पूनम पिछले कई सालों से रंगमंच से जुड़ी हैं । पूनम अरोरा 25 अप्रैल को मंचित होने वाले महानाट्य “जो लड़े दीन के हेत” की कास्ट्यूम भी डिज़ाईन करेंगी ।