झाबुआ समाचार | आदिवासी अधिकार | वन भूमि विवाद | मध्य प्रदेश सरकार
झाबुआ। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 37 लाख हेक्टेयर वन भूमि के निजीकरण के विरोध में राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। जयस ने सरकार की इस नीति को आदिवासी अधिकारों का उल्लंघन करार देते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि यह योजना वापस नहीं ली गई तो पूरे राज्य में आंदोलन और भूख हड़ताल की जाएगी।
वन कानूनों का इतिहास और आदिवासी समुदाय पर प्रभाव
जयस ने ज्ञापन में बताया कि ब्रिटिश शासन के दौरान 1862 में वन विभाग की स्थापना हुई और 1864, 1878 एवं 1927 में वन कानून बनाए गए, जिनके कारण वनवासियों के पारंपरिक अधिकारों का हनन हुआ। भारतीय संविधान लागू होने के 75 वर्षों बाद भी वन विभाग द्वारा आदिवासी समाज पर ऐतिहासिक अन्याय किया जा रहा है।
जयस ने आरोप लगाया कि वन विभाग ने बिना वैज्ञानिक आधार के 37 लाख हेक्टेयर भूमि को ‘उजाड़’ और ‘बंजर’ घोषित किया, जिससे इस भूमि को निजी कंपनियों को सौंपने का रास्ता साफ किया जा सके। संगठन ने वन अधिकार अधिनियम 2006, संविधान की 5वीं अनुसूची और अन्य कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि यह भूमि आदिवासियों और वनवासियों की आजीविका से जुड़ी है।
सरकार और वन विभाग से उठाए गए सवाल
जयस ने अपने ज्ञापन में मध्य प्रदेश सरकार और वन विभाग से कई अहम सवाल उठाए:
- वर्तमान में मध्य प्रदेश में आरक्षित, संरक्षित और असीमांकित वन भूमि की सटीक जानकारी क्या है?
- क्या यह भूमि भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 20 और 29 के तहत अधिसूचित की गई है?
- धारा 5 से 19 तक की कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं या नहीं?
- वन विभाग किस आधार पर इन जमीनों को ‘उजाड़’ और ‘बंजर’ मान रहा है?
- क्या सरकार और वन विभाग ने इस निर्णय में आदिवासी समुदाय की सहमति ली है?

आंदोलन की चेतावनी
जयस ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस प्रस्ताव को वापस नहीं लिया, तो संगठन अन्य आदिवासी संगठनों के साथ मिलकर मध्य प्रदेश में आंदोलन करेगा और भूख हड़ताल शुरू करेगा।
ज्ञापन सौंपने वालों में जयस जिलाध्यक्ष विजय डामोर, ब्लॉक अध्यक्ष बंटी सिंगार, सरदारपुर अध्यक्ष सुनील डामोर, प्रवीन कटारे, राकेश भाबर, कमजी मेडा, दीवान मेडा, बालू डामोर, भूरू डामोर सहित कई अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
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