Jhabua-Farmer-Success: हमारे देश में खेती को हमेशा घाटे का सौदा बताकर किस्मत या सिस्टम को कोसा जाता है। किसान मौसम की मार सहता है, कभी बीज खराब तो कभी बाजार में भाव नहीं मिलता। लेकिन अगर कोई किसान पारंपरिक खेती का ‘रट्टा’ छोड़कर नई तकनीक पकड़ ले, तो वह सिस्टम और बाजार दोनों को अपनी उंगलियों पर नचा सकता है।
झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखंड (ग्राम मोहनपुरा) के प्रगतिशील किसान चंद्रपाल सिंह राठौर ने बिल्कुल यही किया है। कभी सोयाबीन और गेहूं बोकर साल भर में बमुश्किल 42 हजार रुपये बचाने वाले चंद्रपाल आज ‘शेडनेट हाउस’ (Shade Net House) में खीरा उगाकर सालाना 10 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कूट रहे हैं!
Jhabua-Farmer-Success जब 42 हजार में नहीं चला घर, तो बदला खेती का तरीका
चंद्रपाल सिंह राठौर पहले बाकी किसानों की तरह ही अपने खेत में सोयाबीन और गेहूं की पारंपरिक खेती करते थे।
- लागत आती थी लगभग 35 हजार रुपये, और कुल उत्पादन बिकता था 77 हजार में।
- यानी साल भर खून-पसीना बहाने के बाद हाथ में शुद्ध मुनाफा आता था सिर्फ 42 हजार रुपये।
- इस मामूली आय में परिवार का खर्च चलाना किसी सपने जैसा था। लेकिन उन्होंने हार मानकर रोने के बजाय उद्यानिकी विभाग का दरवाजा खटखटाया।

MIDH योजना का मिला साथ, लगा 28 लाख का ‘शेडनेट’
विभाग के मार्गदर्शन में चंद्रपाल ने MIDH योजना (Mission for Integrated Development of Horticulture) का फायदा उठाया और अपनी 0.40 हेक्टेयर जमीन पर शेडनेट हाउस तान दिया।
- इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत 28.40 लाख रुपये थी।
- इसमें से शासन ने 50% (14.20 लाख रुपये) का भारी-भरकम अनुदान (Subsidy) दिया।
- बस, यहीं से घाटे की खेती का गियर बदला और मुनाफे की रफ्तार शुरू हो गई।
24 गुना बढ़ गई कमाई, 800 क्विंटल खीरे का उत्पादन
शेडनेट हाउस तैयार होते ही चंद्रपाल ने उसमें उन्नत किस्म ‘एफ-1 एमिस्टार’ (F1 Amistar) खीरे की खेती शुरू कर दी। संरक्षित खेती का कमाल देखिए कि फसल पर ना तो मौसम की कोई मार पड़ी और ना ही क्वालिटी बिगड़ी।
- शेडनेट हाउस से उन्हें 800 क्विंटल बंपर खीरे का उत्पादन मिला।
- इस पूरी खेती में लागत आई 6 लाख रुपये, और बाजार में खीरा बिका 16 लाख रुपये में।
- यानी सारे खर्चे काटकर सीधे 10 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा जेब में!
किसानों के लिए क्या है सबक?
चंद्रपाल की यह कहानी उन सभी किसानों के लिए एक खुला सबक है जो आज भी मौसम और पुरानी फसलों के भरोसे बैठे हैं। संरक्षित खेती से फसल पर बेमौसम बारिश या तेज धूप का असर नहीं होता। उत्पाद की क्वालिटी ‘ए-वन’ (A-1) रहती है, इसलिए बाजार में व्यापारी मुंहमांगा दाम देता है। जब तक हमारे किसान नई तकनीक और सरकारी योजनाओं की सब्सिडी का फायदा उठाकर खुद को ‘स्मार्ट’ नहीं बनाएंगे, तब तक वे ऐसे ही घाटे का रोना रोते रहेंगे।
बाकी तो जो है सो है ही ।
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