Bhili Syllabus Jhabua: देश में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू हुए पूरे 6 साल हो चुके हैं। इस नई शिक्षा नीति का सबसे बड़ा और खूबसूरत सपना यही था कि शिक्षा का सिर्फ डिजिटलीकरण और स्मार्ट क्लास तक ही सीमित न रहे, बल्कि कक्षा 1 से 5 तक के छोटे बच्चों को उनकी स्थानीय या मातृभाषा में ही पढ़ाया जाए। कागजों पर यह योजना जितनी शानदार दिखती है, जमीन पर इसकी हकीकत उतनी ही पेचीदा है।
झाबुआ एक आदिवासी बाहुल्य जिला है, जहां की मुख्य बोली और भाषा ‘भीली’ है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत झाबुआ जिले के लिए भीली भाषा में नर्सरी से लेकर प्राइमरी (कक्षा 5) तक का खास पाठ्यक्रम (Syllabus) तैयार किया गया है। लेकिन सिस्टम की लेटलतीफी का आलम यह है कि 6 साल बीत जाने के बाद भी यह किताबें अब तक जिले के स्कूलों और बच्चों के बस्ते तक नहीं पहुंच सकी हैं।
NCERT दिल्ली में अटकी फाइल, कोर कमेटी करेगी फाइनल चेकिंग
झाबुआ के बच्चों को अपनी मातृभाषा में कब पढ़ने को मिलेगा, यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है। फिलहाल यह पूरा मामला दिल्ली स्थित एनसीईआरटी (NCERT) के पास पेंडिंग है। जानकारी के अनुसार, वहां पाठ्यक्रम की छपाई (Printing) होने के बाद यह एक बार फिर से झाबुआ की उस ‘कोर कमेटी’ के पास पहुंचेगा, जिसने दिन-रात मेहनत करके इसे तैयार किया है।
कोर कमेटी इस बात की बारीकी से जांच करेगी कि छपाई में कोई गलती, शब्दों का हेरफेर या किसी तरह की कोई खामी तो नहीं रह गई है। इन तमाम संभावनाओं को टटोलने और कमियों को सुधारने के बाद ही इस भीली पाठ्यक्रम को अंतिम रूप (Finalize) दिया जाएगा और तब जाकर यह स्कूलों में लागू हो सकेगा।
Bhili Syllabus Jhabua 8 किताबों का भीली में शैक्षणिक पाठ्यक्रम ,’मन की बात’ और आदिवासी पर्व भी पढ़ने मिलेंगे भील में ।
इस भीली पाठ्यक्रम को बहुत ही शोध और मेहनत के साथ तैयार किया गया है। अंग्रेजी और गणित जैसे तकनीकी विषयों को छोड़कर बाकी 8 पुस्तकों को पूरी तरह से स्थानीय भीली भाषा में ढाला गया है।
इस पाठ्यक्रम की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि झाबुआ की माटी की महक है। इन किताबों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ के अहम हिस्सों को शामिल किया गया है। इसके अलावा, आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, उनकी सदियों पुरानी परंपराओं, स्थानीय त्योहारों और पर्वों को भी बड़े ही सुंदर ढंग से इन किताबों का हिस्सा बनाया गया है, ताकि बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

बालवाटिका का पाठ्यक्रम भी भीली बोली में तैयार किया गया है । लेकिन इस पर अभी काम शुरू नहीं हुआ है । बताते हैं कि टाइपिंग को लेकर काम अटका है । पाठ्यक्रम तैयार करने वाली कोर कमेटी से जुड़ीं सदस्य मंगला गरवाल ने ‘झाबुआ पोस्ट’ को बताया कि भीली भाषा में बच्चों का पाठ्यक्रम पूरी तरह से तैयार है और अब अपने अंतिम चरण में है। उन्होंने बताया कि बालवाटिका के छोटे बच्चों के लिए तीन बेहतरीन पुस्तकें तैयार की गई हैं, लेकिन टाइपिंग की भारी परेशानी और बजट के चलते काम पेंडिंग पड़ा हुआ है।
प्राथमिक स्तर पर जो भीली भाषा में पाठ्यक्रम तैयार किया गया, उसके टाइपिंग के भुगतान (Payment) को लेकर भी दिक्कतें आई । महीनों की मेहनत के बाद जब ड्राफ्ट तैयार हुआ, तो उसे टाइप करवाने के लिए अपनी खुद की जेब से पैसे देकर इस ड्राफ्ट को टाइप करवाया।
उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही पाठ्क्रम का प्रकाशन होने के बाद इसका रिवीजन कर ये बच्चों तक पहुंचेगी । बालवाटिका के लिए जो समस्या आ रही उसको भी दूर किया जाएगा ।
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