झाबुआ कलेक्टर कार्यालय:  जिले में हो रहे विकास को देखने के लिए दिन में भी बिजली बल्ब की जरूरत”

झाबुआ जिले में बिजली बचाने का संदेश देने वाली सरकार के प्रयासों को शायद कलेक्टर कार्यालय ने कुछ ज्यादा ही दिल पर ले लिया है। अब ये बचत ऐसी हो गई है कि सूरज अपनी पूरी रोशनी बिखेर रहा होता है, लेकिन कलेक्टर कार्यालय परिसर में बल्ब जलते ही रहते हैं! शुक्रवार को शीतला सप्तमी…

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झाबुआ जिले में बिजली बचाने का संदेश देने वाली सरकार के प्रयासों को शायद कलेक्टर कार्यालय ने कुछ ज्यादा ही दिल पर ले लिया है। अब ये बचत ऐसी हो गई है कि सूरज अपनी पूरी रोशनी बिखेर रहा होता है, लेकिन कलेक्टर कार्यालय परिसर में बल्ब जलते ही रहते हैं!

झाबुआ कलेक्टर कार्यालय:  जिले में हो रहे विकास को देखने के लिए दिन में भी बिजली बल्ब की जरूरत"

शुक्रवार को शीतला सप्तमी की छुट्टी थी, फिर शनिवार-रविवार का अवकाश भी लग गया। नतीजा? लगातार तीन दिन से सरकारी बिजली का मुफ्त ‘सत्कार’ हो रहा है। सरकारी दफ्तर में बिजली बचाने की मुहिम तो खूब चलाई जाती है, लेकिन शायद ये अभियान सिर्फ जनता के लिए होता है, दफ्तरों के लिए नहीं!

झाबुआ कलेक्टर कार्यालय:  जिले में हो रहे विकास को देखने के लिए दिन में भी बिजली बल्ब की जरूरत"

अब इसे सरकारी आराम पसंदगी कहें या ‘रौशनी’ प्रेम, लेकिन हकीकत यही है कि झाबुआ कलेक्टर कार्यालय का परिसर रात में ही नहीं, दिन में भी टिमटिमाता रहता है। लगता है, जिले में हो रहे विकास को देखने के लिए दिन में भी बिजली बल्ब की जरूरत पड़ रही है!

झाबुआ कलेक्टर कार्यालय:  जिले में हो रहे विकास को देखने के लिए दिन में भी बिजली बल्ब की जरूरत"

अफसरों को खुद बिजली का बिल भरना पड़े, तब शायद उन्हें समझ आए कि बिजली बचाना कितना जरूरी है! लेकिन जब जेब से पैसा नहीं जा रहा हो, तो रोशनी की चिंता क्यों करें?

बिजली विभाग को शायद अब एक नया नारा देना चाहिए –
“बिजली बचाओ, मगर सरकारी दफ्तर में नहीं!”

बाकी तो जो है सो है ही!!

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virendra singh rathore
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संस्थापक और संपादक है, 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं । नेशनल,रीजनल चैनल में रिपोर्टिंग का अनुभव । डिजिटल पत्रकार के रूप मे भी सक्रिय हैं.

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