27 मार्च को झाबुआ में मुख्यमंत्री का दौरा है। कन्या विवाह योजना के तहत 1100 जोड़ों का सामूहिक विवाह होना है। हवाई पट्टी पर तैयारियां जोरों पर हैं। पीडब्ल्यूडी के लगभग 47 कर्मचारी हेलीपैड और बेरिकटिंग में जुटे हैं, ताकि सीएम के कार्यक्रम स्थल को सजाया-संवारा जा सके। लेकिन इन तैयारियों के पीछे जो हाथ हैं, उनकी तकलीफें शायद ही कभी सुनी जाती हैं।

सालों से जारी अस्थायी मजदूरी
झाबुआ के पीडब्ल्यूडी में काम करने वाले दरियाव सिंह (59) बताते हैं, “जब मैंने यह काम शुरू किया था, तब दिनभर की मजदूरी सिर्फ 1 रुपया थी। धीरे-धीरे यह बढ़ी, लेकिन नौकरी आज भी अस्थायी ही है। सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, प्रधानमंत्री बदले, लेकिन हमारी किस्मत नहीं बदली।”
दरियाव अकेले नहीं हैं। उनके साथ काम कर रहे कई मजदूर 30-40 सालों से सरकारी कार्यक्रमों के लिए मेहनत कर रहे हैं, कुछ तो अगले कुछ माह में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। लेकिन अब भी उन्हें स्थायी नौकरी नहीं मिली। स्थायी नौकरी की सुरक्षा के बिना उनका भविष्य अंधेरे में है। दलसिंह बताते हैं जिला अस्पताल का काम चालू हुआ था, कलेक्टर मालपानी हुआ करते थे, तब वो मजदूरी पर लगे थे, पहली पगार 90 रूपए मिली थी!
ना कोई संगठन, ना जागरूकता, इसलिए इनकी पीडा सुनी नहीं गई!

झाबुआ में वीवीआईपी , वीआईपी और विस्मृत श्रमिक
चाहे गणतंत्र दिवस हो, स्वतंत्रता दिवस या किसी मंत्री का दौरा—इन्हीं श्रमिकों के हाथों से सरकारी कार्यक्रमों के मंच तैयार होते हैं, लेकिन इनके लिए कोई मंच नहीं सजता। मजदूरों में से ज्यादातर आदिवासी समाज से आते हैं। सरकार आदिवासियों के विकास की बातें तो करती है, लेकिन इन्हीं आदिवासी श्रमिकों की सुध लेने वाला कोई नहीं।
एक नजर, जो बदल दे तकदीर
झाबुआ की इसी धरती पर कई मुख्यमंत्री आए, देश के प्रधानमंत्री आए, बड़े-बड़े मंच सजे, स्वागत-सम्मान हुआ—लेकिन वे मंच तैयार करने वाले ये श्रमिक आज भी स्थायी नौकरी के इंतजार में हैं। अब वे सरकार से बस एक नजर उम्मीद भरी नजर चाहते हैं—जो उन्हें भी सम्मान और सुरक्षा की गारंटी दे सके।
आज कोई मजदूर दिवस नहीं है, मजदूर दिवस की औपचारिकता और रस्म अदायगी से इतर जरूरी है कि इन मेहनतकश लोगों को भी सुना जाए, पूछा जाए, जो आज तक अपने मन की बात किसी को बता नहीं पाए!