झाबुआ में नियमों की अनदेखी कर संचालित हो रही गिट्टी खदानें, विभाग की अनदेखी पर सवाल

झाबुआ जिले में संचालित स्टोन क्रेशर गिट्टी की खदानें पर्यावरणीय नियमों और गाइडलाइंस की अनदेखी का एक बड़ा उदाहरण बन गई हैं। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण..

झाबुआ स्टोन क्रेशर गिट्टी खदान में गड़बड़ी ।

झाबुआ जिले में संचालित स्टोन क्रेशर गिट्टी की खदानें पर्यावरणीय नियमों और गाइडलाइंस की अनदेखी का एक बड़ा उदाहरण बन गई हैं। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से दी गई स्पष्ट गाइडलाइंस को दरकिनार कर इन खदानों का संचालन किया जा रहा है। यह न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों और फसलों के लिए भी गंभीर समस्या बन चुका है।

नियमों की अनदेखी

  • प्रदूषण नियंत्रण: खदानों से निकलने वाली डस्ट (धूल) स्थानीय निवासियों की सेहत पर बुरा प्रभाव डाल रही है। सांस लेने में तकलीफ, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
  • फसलों पर प्रभाव: उड़ती हुई धूल से आसपास की कृषि भूमि प्रभावित हो रही है, जिससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में कमी आ रही है।
  • लीज का दुरुपयोग: कई जगहों पर खदान संचालकों द्वारा आवंटित क्षेत्र से अधिक खुदाई की जा रही है।
  • रॉयल्टी चोरी: सरकारी राजस्व को चूना लगाते हुए खदानों में रॉयल्टी की चोरी की घटनाएं सामने आई हैं।

स्वास्थ्य पर प्रभाव

स्टोन क्रेशर से निकलने वाली धूल ने स्थानीय निवासियों की स्वास्थ्य स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। देवझिरी में एनएच 47 के पास ही अलग-अलग स्टोन क्रेशन खदानें है , जिनसे उड़ती डस्ट वाहन चालकों के लिए परेशानी खड़ी कर रही है ।

  • श्वसन संबंधी समस्याएं: उड़ती धूल से लोगों को सांस लेने में कठिनाई, दमा और फेफड़ों से जुड़ी अन्य बीमारियां हो रही हैं।
  • त्वचा और आंखों की समस्या: धूल के लगातार संपर्क में रहने से त्वचा की एलर्जी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
  • गंभीर बीमारियां: लंबे समय तक धूल के संपर्क में रहने से कैंसर और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

फसलों पर असर

स्टोन डस्ट का असर न केवल इंसानों पर, बल्कि फसलों पर भी पड़ता है।

  • फसलों की उत्पादकता में कमी: धूल की परत फसलों की पत्तियों पर जम जाती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) की प्रक्रिया बाधित होती है।
  • मिट्टी की उर्वरता घटती है: धूल मिट्टी में मिलकर उसकी पोषकता को कम कर देती है।
  • फसल की गुणवत्ता पर प्रभाव: खराब मिट्टी और पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण फसलों की गुणवत्ता में गिरावट आती है।

पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन

मध्यप्रदेश प्रदूषण बोर्ड और एनजीटी की गाइडलाइंस के अनुसार:

  1. स्टोन क्रेशर यूनिट्स को डस्ट कंट्रोल सिस्टम लगाना आवश्यक है।
  2. खदानों के आसपास हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) विकसित करनी चाहिए।
  3. खदान संचालन के लिए जल स्रोतों के संरक्षण का ध्यान रखना चाहिए।
  4. खदानों की गतिविधियां स्थानीय निवासियों की सहमति और पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) के आधार पर होनी चाहिए।

ग्रीन बेल्ट का अभाव और कार्रवाई का अभाव: खदान संचालकों द्वारा ग्रीन बेल्ट विकसित न करने की शिकायतों के बावजूद प्रशासन द्वारा इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। यह स्पष्ट करता है कि पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। हरित पट्टी विकसित करना प्रदूषण कम करने का एक महत्वपूर्ण उपाय है, लेकिन इसका अनुपालन न करने वाले संचालकों पर जुर्माना लगाने या संचालन रोकने जैसे कदम उठाने में प्रशासन नाकाम रहा है।

स्थानीय लोगों का विरोध

जिले के अलग-अलग स्थानों पर संचालित होने वाली स्टोन क्रेशर खदानों से होने वाले नुकसान के खिलाफ आवाज उठाई है। उनका कहना है कि खदान संचालकों की लापरवाही से उनके जीवन और आजीविका पर संकट आ गया है। सरकार और संबंधित विभागों से वे तत्काल कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

इन गड़बड़ियों के बावजूद प्रशासन की ओर से ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

  • क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन खदानों का निरीक्षण किया है?
  • एनजीटी के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई हुई है?
  • रॉयल्टी चोरी रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
  • ग्रीन बेल्ट विकसित न करने पर जिम्मेदार संचालकों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है?

झाबुआ जिले में स्टोन क्रेशर गिट्टी खदानों की अनियमितताओं पर अगर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका दुष्प्रभाव न केवल पर्यावरण पर पड़ेगा, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका और स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ेगा।

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