सरकारी पट्टे की जमीन की रजिस्ट्री किसी और के नाम कैसे? – मामला पहुंचा जनसुनवाई में!

झाबुआ ज़िले के पेटलावद जनपद के ग्राम बरवेट की दो पीड़ित महिलाएं इस मंगलवार को कलेक्टर जनसुनवाई में पहुंचीं और एक गंभीर मामला अधिकारियों के..

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झाबुआ ज़िले के पेटलावद जनपद के ग्राम बरवेट की दो पीड़ित महिलाएं इस मंगलवार को कलेक्टर जनसुनवाई में पहुंचीं और एक गंभीर मामला अधिकारियों के सामने रखा। इनका आरोप है कि जिस जमीन पर वे वर्षों से रह रही हैं और जो जमीन सरकारी पट्टे में दी गई थी, उसकी रजिस्ट्री किसी और व्यक्ति के नाम कर दी गई है।

पीड़ित मोना पति विक्रमसिंह राठौर और गायत्री पति भैरूसिंह राठौर ने आवेदन में बताया कि यह जमीन सरकारी पट्टा थी और उनके नाम से आवंटित थी। लेकिन अब कुछ प्रभावशाली लोगों ने उस पर कब्जा कर लिया है और प्रशासन की मिलीभगत से फर्जी भू-स्वामी प्रमाण पत्र बनवाकर रजिस्ट्री भी करवा ली है।

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क्या कहती हैं पीड़ित महिलाएं?

मोना और गायत्री दोनों विधवा हैं। उन्होंने बताया कि उनके पति की असमय मौत हो चुकी है और वे अपने बच्चों के साथ कई सालों से इस जमीन पर निवास कर रही हैं। उनके अनुसार, यह जमीन सरकारी रिकॉर्ड में अब भी शासकीय जमीन के रूप में दर्ज होनी चाहिए, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से इसे निजी बता दिया गया और किसी और के नाम रजिस्ट्री कर दी गई।

उठे गंभीर सवाल:

  • सरकारी पट्टे की जमीन की रजिस्ट्री कैसे हो सकती है?
    जमीन जब तक पूर्ण रूप से फ्रीहोल्ड न हो, तब तक उसका क्रय-विक्रय नहीं हो सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि भू-स्वामी प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में किस स्तर पर गड़बड़ी हुई?
  • पंचायत भवन के लिए प्रस्तावित जमीन का निजीकरण कैसे हुआ?
    आवेदन में यह भी उल्लेख है कि यह जमीन कभी पंचायत भवन के लिए भी प्रस्तावित थी। अगर ऐसा है, तो यह शासकीय उपयोग के लिए आरक्षित भूमि मानी जाती है। फिर उस पर किसी एक व्यक्ति का हक़ कैसे स्थापित हो गया?
  • राजस्व और पंचायत विभाग की भूमिका पर सवाल
    शिकायत में पंचायत सचिव और राजस्व अमले की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। अगर बिना जांच के भू-स्वामी प्रमाण पत्र जारी किया गया, तो जिम्मेदारी किसकी है?

कार्रवाई की मांग

पीड़ित महिलाओं ने झाबुआ कलेक्टर से इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि अगर न्याय नहीं मिला, तो वे बच्चों सहित सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करेंगी।

बरवेट गांव का यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का संकेत देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे कमजोर और विधवा महिलाओं के हक़ को ताकतवर लोग हड़पने की कोशिश करते हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले में कितना संज्ञान लेता है और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।

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