1 जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है। दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भारत लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। वर्तमान में विश्व का 25 प्रतिशत दूध का उत्पादन अकेले भारत कर रहा है और इस मामले में यह पूरी दुनिया में नंबर वन पर है। देश के भीतर राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश टॉप पर है, उसके बाद राजस्थान और फिर मध्य प्रदेश का नंबर आता है। देश के कुल दुग्ध उत्पादन में मध्य प्रदेश का 8-9 प्रतिशत योगदान है और यह गुजरात से भी आगे है।
मध्य प्रदेश सरकार का प्रयास है कि प्रदेश को लगातार दुग्ध उत्पादन में और आगे बढ़ाया जाए। इसके लिए सरकार अलग-अलग तरह की योजनाएं चला रही है, जिनमें से इस समय ‘डेयरी प्लस’ और ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना’ महत्वपूर्ण हैं। जो लोग छोटे स्तर से शुरुआत करना चाहते हैं, उनके लिए डेयरी प्लस एक बेहतरीन विकल्प है। वहीं, जो लोग इसे एक उद्यम (Enterprise) की तरह लेना चाहते हैं, उनके लिए कामधेनु योजना बहुत बढ़िया है। इस योजना में 25 गाय या भैंस की डेयरी के लिए योजना है। जिसमें 33 प्रतिशत एसटी – एसी वर्ग के लिए सब्सिडी का प्रावधान है जबकि सामान्य और अन्य वर्ग के लिए 25 प्रतिशत सब्सिडी राज्य सरकार की ओर से है ।
मुख्यमंत्री डेरी प्लस योजना हरियाणा से मुर्रा नस्ल की दो भैंस हितग्राही को दी जाती हैं। जिसमें अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग को 75% अनुदान एवं सामान्य एवं पिछड़ा वर्ग को 50% अनुदान है। जिले के 55 हितग्राहियों को 110 भैंसे प्रदाय की गई है, जिससे दुग्ध उत्पादन बढ़ा है।
सरकार की कोशिश यही है कि इन योजनाओं के जरिये मध्य प्रदेश को दुग्ध उत्पादन में सिरमौर बनाया जाए।
झाबुआ में मानक से अधिक है दूध की उपलब्धता झाबुआ जिले में दुग्ध उत्पादन की बात करें तो यह भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के तय मानकों से भी आगे है। राष्ट्रीय मानक के अनुसार एक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 333 ग्राम दूध की उपलब्धता जरूरी है, जबकि झाबुआ में यह उपलब्धता 499 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। झाबुआ में सांची सहकारी समितियों के माध्यम से रोज 18 हजार से 19 हजार लीटर दूध का संकलन होता है। सालाना करीब 249 हजार मैट्रिक टन होता है । ये वो आंकडे जो सहकारी समतियों के माध्यम से दुध सांची के पास पहुंचता है । निजी तौर पर बेचे वाले दुध के आंकड़े अलग हैं ।

जिले में करीब 77,100 दुधारू पशु हैं। हालांकि, इनमें से अधिकतर पशु देसी और अवर्णित (Non-descript) नस्ल के हैं। पशुपालन और डेयरी विभाग का निरंतर प्रयास है कि किसान ज्यादा से ज्यादा उन्नत देसी और वर्णित नस्लों को बढ़ावा दें। वर्तमान में देश में ‘गिर’ और ‘साहीवाल’ सबसे बेहतरीन देसी वर्णित नस्लों में मानी जाती हैं। गिर गाय विशेषकर अपने ए-2 (A-2) दूध और घी के लिए पाली जाती है। इसके अलावा, किसान भैंस और विदेशी नस्ल की गायें भी पाल रहे हैं। हालांकि, भैंसों में भी किसानों के पास अवर्णित नस्ल की संख्या अधिक है। मुख्य रूप से व्यावसायिक डेयरियों में ही उच्च गुणवत्ता वाली वर्णित नस्लों को पाला जा रहा है, भैंस की वर्णित और उन्नत नस्लों में मुर्रा, जाफराबादी, सुरती और भदावरी है। भदावरी भैंस का पालन घी के लिए किया जाता है। जिससे बेहतर दुग्ध उत्पादन के साथ-साथ अच्छा मुनाफा भी लिया जा रहा है।
झाबुआ के प्रभारी उपसंचालक डॉ. दिवाकर बताते हैं कि जिले में लगातार दुग्ध उत्पादन और संकलन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में जिले में 90 नवीन और पुनर्जीवित समितियां शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें से अभी तक 29 समितियां शुरू भी की जा चुकी हैं, जिनसे रोजाना 1500 से 2000 लीटर प्रतिदिन दूध संकलन बढ़ा है। आगे भी सरकार की विभिन्न योजनाओं को लेकर किसानों और पशुपालकों को जागरूक किया जा रहा है ताकि वे इनका लाभ ले सकें। 8.40 रूपए प्रति फैट दाम दिया जा रहा है ।
वहीं, डॉ. अमित दोहरे बताते हैं कि इसके साथ ही विभाग कृत्रिम गर्भाधान पर भी विशेष ध्यान दे रहा है, ताकि दूध उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ-साथ पशुओं की नस्ल सुधार भी हो सके, जिसका सीधा फायदा हमारे किसानों और पशुपालकों को मिलेगा।













