कड़कनाथ
कड़कनाथ मुर्गा, जिसे ‘काली मासी’ के नाम से भी जाना जाता है, मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले की एक अनूठी प्रजाति है। इसकी काली त्वचा, मांस, और हड्डियाँ इसे अन्य मुर्गा प्रजातियों से अलग बनाती हैं। इसका काला रंग मेलानिन की उच्च मात्रा के कारण होता है, जो इसे औषधीय गुणों से भरपूर बनाता है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है, जिसके कारण इसकी मांग देशभर में बढ़ रही है।
कड़कनाथ का मांस अपने पौष्टिक गुणों के लिए प्रसिद्ध है। केंद्रीय खाद्य परीक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, मैसूर के एक शोध के अनुसार, इसका मांस आसानी से पचने वाला और कम कोलेस्ट्रॉल वाला होता है। इसमें 25.47% प्रोटीन, मात्र 3.4% चर्बी, और 70.33% आर्द्रता पाई गई है। यह कम वसा और उच्च प्रोटीन की मात्रा इसे हृदय रोगियों के लिए एक आदर्श आहार बनाती है।
इसके अलावा, कड़कनाथ में आयरन, जिंक, और विटामिन बी की अच्छी मात्रा होती है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करती है। यह रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में भी सहायक है।
हृदय रोगियों के लिए श्रेष्ठ: कड़कनाथ के स्वास्थ्य लाभ

झाबुआ का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व
कड़कनाथ सिर्फ एक मुर्गा प्रजाति नहीं, बल्कि झाबुआ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। स्थानीय आदिवासी समुदाय इसे अपने पारंपरिक व्यंजनों और धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग करते हैं। इसके मांस की बढ़ती मांग ने इसे स्थानीय किसानों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना दिया है। झाबुआ का कड़कनाथ न केवल मध्यप्रदेश, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी अपनी पहचान बना रहा है।
विलुप्ति का खतरा: कड़कनाथ पर मंडराता संकट
कड़कनाथ की लोकप्रियता के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ी है, लेकिन आपूर्ति सीमित होने से इस प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। मांग और आपूर्ति के इस असंतुलन ने कड़कनाथ के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे बचाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने कई कदम उठाए हैं।
झाबुआ में कड़कनाथ संरक्षण के प्रयास
मध्यप्रदेश सरकार ने कड़कनाथ के लिए ब्रांडिग और मार्केटिंग कर रही है । युवाओं को कड़नकनाथ मुर्गी पालन से जोड़ते हुए उन्हें मार्गदशर्न और सहायता भी उपलब्ध करवाई जा रही है । ऐसे लोगों की भी कहानी हम जल्द आपके सामने लेकर आएंगे ।
झाबुआ के शासकीय कड़कनाथ कुक्कुट प्रक्षेत्र में वर्तमान में 1000 से अधिक इस प्रजाति के मुर्गे-मुर्गियां हैं। हाल ही में यहाँ सेटर और हेचर मशीनें लगाई गई हैं, जो तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित कर अंडों से चूजों का उत्पादन करती हैं। यह तकनीक इनकी संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
झाबुआ के अधिकारियों का कहना है कि इस प्रजाति का विकास अब मध्यप्रदेश के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी किया जा रहा है। यह प्रयास न केवल कड़कनाथ को बचाने में मदद कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय किसानों की आजीविका को भी बढ़ावा दे रहे हैं।
हो चुका है ग्लोबल मार्केट तैयार, चल रही अलग-अलग योजनाएं ।
कड़कनाथ मुर्गा झाबुआ की शान है और इसे संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है। इस प्रजाति को लेकर स्थानीय ही नहीं एक ग्लोबल मार्केट तैयार हो चुका है , लेकिन उसका लाभ स्थानीय युवा उद्यमी कम उठा पा रहे हैं । क्योंकि इस प्रजाति के मुर्गी पालन में कई चुनौतियां है ।इसको लेकर अलग-अलग सरकारी योजनाएं भी जिनमें अनुदान पर हितग्राहियों को चुजे वितरित किए जाते हैं । जिससे इनका संरक्षण हो सके साथ ही हितग्राहियों को आजीविका का जरिया मिले ।
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