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कांतिलाल भूरिया 8 वीं बार लड़ेंगे चुनाव, 45 साल से राजनीति में, जानिए उनकी राजनैतिक सफर!

रतलाम-झाबुआ सीट से कांतिलाल भूरिया 8 वीं बार लड़ेंगे चुनाव, 45 साल से राजनीति में, जानिए उनकी राजनैतिक सफर!

के लाल
कांतिलाल भूरिया,  क्रांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार


कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को कांग्रेस एक बार फिर रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है । हालांकि ये पहले से ही तय था कि कांतिलाल भूरिया ही कांग्रेस का चेहरा होंगे, क्योंकि इस सीट पर उनके सामने दूसरा मुफीद चेहरा पार्टी के पास नहीं है । उनके अनुभव के सामने युवा हर्ष गेहलोत का नाम जरूर चला लेकिन मुहर कांतिलाल भूरिया के नाम पर ही लगी । 45 साल से ज्यादा के राजनैतिक अनुभव को दरकिनार करना आसान भी नहीं था ।

कांतिलाल भूरिया साल 1977 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े थे, झाबुआ की थांदला विधानसभा सीट से उन्होंने अपने राजनैतिक करियर की शुरूआत की थी, लेकिन भूरिया पहला चुनाव हार गए थे । साल 1977 में कांतिलाल भूरिया जनता पार्टी के मन्नाजी 4906 वोटों से हराया था, इस समय तक जिले में मामा बालेश्वर दयाल के कारण सोशलिस्ट पार्टी का अच्छा खासा प्रभाव था ।

साल 1980 में दूसरी बार थांदला विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और जीतकर मध्यप्रदेश की विधानसभा पहुंचे । इस जीत के बाद फिर भूरिया ने पीछे मुड़ के नहीं देखा, वक्त के साथ उनका औरा प्रदेश और देश की राजनीति में बढ़ता ही चल गया और प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के रूप उन्होंने अपनी पहचान बनाई । 1980 में जीत के बाद अजुर्न सिंह सरकार में भूरिया को संसदीय सचिव बनाया गया ।

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कांतिलाल भूरिया 1977 में लड़े थे पहला चुनाव ।

1980 से भूरिया लगातार 1993 तक चार चुनाव जीते, 1993 में दिग्विजय सिंह सरकार में वे आदिमजाति मंत्री भी रहे । 1998 में कांतिलाल भूरिया ने लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की, इसके बाद उन्होंने 1999, 2004, 2009 के चुनाव में जीत दर्ज कर UPA-1 और UPA-2 मंत्री रहे । साल 2013 में उन्हें मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया ।

साल 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस एक बार फिर उन्हें 5 वीं बार रतलाम-झाबुआ से अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन इस बार कांतिलाल भूरिया मोदी लहर में ये सीट 1 लाख 10 वोट से हार गए, उन्हें बीजेपी के दिलीपसिंह भूरिया ने शिकस्त दी । 2014 के चुनाव में मिली हार के बाद ज्यादा दिन तक कांतिलाल भूरिया देश की संसद से दूर नहीं रहे, 24 जून 2015 को बीजेपी सांसद दिलीपसिंह भूरिया के निधन के बाद नवंबर 2015 लोकसभा उपचुनाव हुए और कांतिलाल भूरिया 88 हजार वोटों से चुनाव जीते ।

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2019 के चुनावों में कांग्रेस ने एक बार फिर उन्हें अपना चेहरा बनाया था, लेकिन ये मोदी लहर में हार गए । बीजेपी के गुमान सिहं डामोर ने कांतिलाल भूरिया करीब 90 हजार वोटों से शिकस्त दी । लेकिन सांसदी और विधायकी ज्यादा दिन कांतिलाल भूरिया से दूर नहीं रह सकती । सांसद का चुनाव जीते गुमान सिंह डामोर 2018 के विधानसभा चुनाव में झाबुआ से विधायक बने थे । सांसद बनने के बाद विधायक पद से इस्तीफा दिया । जिसके चलते साल 2019 में झाबुआ सीट पर विधानसभा उपचुनाव हुआ । कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया को अपना उम्मीदवार बनाया । कांतिलाल भूरिया ने ये चुनाव 27 हजार वोट से जीता । उनके चुनाव के जीतने के बाद उनके डिप्टी सीएम बनने की बातें और चर्चाएं लगातार तैरती रही । लेकिन चर्चाएं हकीकत बन पाती उसके पहले ही 15 महीने की कांग्रेस सरकार गिर गई ।

साल 2023 के विधानसभा चुनाव में झाबुआ विधानसभा सीट से कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रांत भूरिया को अपना उम्मीदवार बनाया, विक्रांत ये चुनाव करीब 15 हजार वोटों से जीते ।

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए एक बार फिर से झाबुआ-रतलाम संसदीय सीट से कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया का ऐलान किया है । कांतिलाल भूरिया लगातार रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट से ये 8 वां चुनाव लड़ेगें, 5 बार के सांसद रह चुके, कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया के 45 साल की राजनीति में केवल 3 चुनावों में हार मिली । एक बार वे विधायक का चुनाव हारे हैं, वहीं दो बार उन्हें लोकसभा में हार का मुंह देखना पड़ा ।

प्लस पाइंट-

कांतिलाल भूरिया कांग्रेस के दिग्गज और प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी नेता .

झाबुआ में भूरिया इज़ कांग्रेस, कांग्रेस इज़ भूरिया ,

5 बार के विधायक, 5 बार सांसद रहे,

प्रदेश में संसदीय सचिव, मंत्री, कैबिनेट मंत्री रहे , मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे.

माइनस प्वाइंट

पुत्र मोह के चलते कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का आरोप,

पार्टी में परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप,

कांतिलाल भूरिया ने अपने बेटे विक्रांत विरोध के बावजूद टिकट दिलवाया, नेताओं की नाराजगी झेलनी पड़ी,

भूरिया ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते किसी भी नए नेता को स्थापित नहीं होने दिया, यही कारण है कि कांग्रेस में जिले में भूरिया के मुकाबले कोई बड़ा नेता नज़र नहीं आता । और यही वजह भी है कि अब भूरिया के खिलाफ पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में अंदरूनी तौर पर नाराजगी भी है ।

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