Jhabua Bus Accident: झाबुआ शहर में सड़कों पर पसरा अतिक्रमण और बेलगाम यातायात एक बार फिर जानलेवा साबित हुआ है। जिला अस्पताल के बाहर हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे में मेवाड़ा राठौर समाज के अध्यक्ष रामचंद राठौड़ का निधन हो गया। रामचंद राठौड़ अस्पताल के बाहर खड़े थे, तभी एक अनियंत्रित तेज रफ्तार बस ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया।
बेकाबू बस उन्हें काफी दूर तक घसीटते हुए ले गई। हादसे के तुरंत बाद उन्हें गंभीर हालत में जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें दाहोद रैफर कर दिया गया। लेकिन अफसोस, रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और बस को जब्त कर लिया है, लेकिन इस दर्दनाक मौत ने पूरे शहर और सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है।

Jhabua Bus Accident मौत का जिम्मेदार कौन? अतिक्रमण या सिस्टम की सियासत
इस दुखद हादसे के बाद शहर की सड़कों के दोनों ओर फैले जानलेवा अतिक्रमण को लेकर एक बार फिर तीखे सवाल खड़े हो गए हैं। नगरपालिका दिखावे के लिए कभी-कभार अतिक्रमण हटाओ मुहिम चलाती है, लेकिन हकीकत यह है कि दुकानदारों ने अपनी दुकानों के बाहर शेड बनाकर और नालियों पर पक्का निर्माण करके आधी सड़क को निगल लिया है। कई रसूखदारों ने तो दुकानों की हदें सड़क तक पक्की कर ली हैं।
इस वजह से ग्राहक अपने दोपहिया वाहन मजबूरी में सड़क से सटकर खड़े करते हैं, जिससे रास्ता और भी ज्यादा संकरा हो जाता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब भी प्रशासन अतिक्रमण हटाने के लिए सड़क पर उतरता है, तो स्थानीय राजनीति शुरू हो जाती है। रसूखदारों के फोन घनघनाने लगते हैं और कार्रवाई बीच में ही रोक दी जाती है। लेकिन आज जब इसी अतिक्रमण और प्रशासनिक ढील के कारण एक शख्स की जान चली गई, तो ये सारे पैरवीकार खामोश बैठे हैं।
गरीब की गुमटी पर जोर, पक्के निर्माण के सामने नतमस्तक है नगरपालिका
यह कोई पहला हादसा नहीं है। झाबुआ में बस स्टैंड से लेकर विजय स्तंभ तक का मार्ग हमेशा से हादसों का हॉटस्पॉट रहा है, लेकिन प्रशासन ने पुरानी घटनाओं से कभी कोई सबक नहीं लिया। नगरपालिका की अतिक्रमण रोधी कार्रवाई भी सिर्फ गरीब की गुमटी, झोपड़ियों और कच्चे अतिक्रमण तक ही सीमित रहती है। जब बात रसूखदारों द्वारा नालियों पर किए गए पक्के अतिक्रमण और सड़क तक पसारे गए दुकानों के सामान को हटाने की आती है, तो नपा के अधिकारी कन्नी काट लेते हैं। इसी दोहरी और लचर नीति के कारण समस्या खत्म होने के बजाय दिन-ब-दिन विकराल होती जा रही है।
कागजों में अटका नया बस स्टैंड, भारी वाहनों का दबाव झेल रही संकरी सड़कें
झाबुआ शहर की बढ़ती आबादी और यातायात का अत्यधिक दबाव भी इस पूरी अव्यवस्था का एक बड़ा कारण है। शहर की आबादी अब 50 हजार के पार जा चुकी है। इसके अलावा, रोजाना आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों ग्रामीण विभिन्न कामों के लिए झाबुआ पहुंचते हैं। ऐसे में शहर का मौजूदा बस स्टैंड अब इस दबाव को झेलने के लिए बहुत छोटा पड़ने लगा है। विजय स्तंभ से बस स्टैंड तक का रास्ता बड़ी बसों और चार पहिया वाहनों के लिए बेहद संकरा और खतरनाक हो चुका है।
हालांकि, शहर के लिए एक नए बस स्टैंड की सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन प्रशासन की सुस्ती देखिए कि अब तक इसके लिए कोई व्यवस्थित जमीन ही नहीं तलाशी जा सकी है।
अब वक्त आ गया है कि प्रशासन कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय जल्द से जल्द नए बस स्टैंड के लिए जमीन तय करे। इसके साथ ही, शहर की सड़कों को निगलने वाले पक्के अतिक्रमण और दुकानों के बाहर पसरे सामान पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के सख्त कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में किसी और को अपनी जान न गंवानी पड़े।
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