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Jhabua: ‘खाद नहीं तो वोट नहीं ; ई-टोकन पर कांग्रेस-बीजेपी आमने सामने, सियासत के बीच कहां है झाबुआ का अन्नदाता!

झाबुआ (Jhabua Post): झाबुआ जिले में इन दिनों ‘खाद’ खेतों से ज्यादा सियासी अखाड़े में बिखरी पड़ी है। मानसून की बेरुखी से पहले ही परेशान अन्नदाता अब ‘ई-टोकन’ (E-Token) सिस्टम के नए चक्रव्यूह में उलझ गया है। हालात ये हैं कि जिले में खाद और ई-टोकन व्यवस्था को लेकर सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के…

jhabua kisan E token

झाबुआ (Jhabua Post): झाबुआ जिले में इन दिनों ‘खाद’ खेतों से ज्यादा सियासी अखाड़े में बिखरी पड़ी है। मानसून की बेरुखी से पहले ही परेशान अन्नदाता अब ‘ई-टोकन’ (E-Token) सिस्टम के नए चक्रव्यूह में उलझ गया है। हालात ये हैं कि जिले में खाद और ई-टोकन व्यवस्था को लेकर सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच जंग छिड़ गई है। कांग्रेस जहां सड़कों पर उतरकर इस सिस्टम को किसानों के लिए जी का जंजाल बता रही है, वहीं सरकार और भाजपा इसे कालाबाजारी रोकने का ‘ब्रह्मास्त्र’ साबित करने में जुटी है। इस पूरी सियासी रस्साकशी के बीच अगर कोई सबसे ज्यादा पिस रहा है, तो वह है झाबुआ का आम किसान।

Jhabua पेटलावद में कांग्रेस का हल्लाबोल: ‘टोकन कहीं का, किसान कहीं का

ई-टोकन व्यवस्था के खिलाफ कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। पेटलावद में कांग्रेस के भारी विरोध प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि जमीनी स्तर पर इस सिस्टम में कई खामियां हैं। कांग्रेस का सीधा आरोप है कि ई-टोकन प्रणाली से किसानों को खाद मिलने के बजाय उनकी परेशानी दोगुनी हो गई है। सर्वर डाउन होने और तकनीकी खामियों के कारण किसान का खेत कहीं और है और उसे टोकन किसी दूसरे इलाके का थमा दिया जा रहा है।

पिछले दिनों यूथ कांग्रेस के प्रदर्शन में थांदला विधायक वीर सिंह भूरिया ने भी खाद की कालाबाजारी का गंभीर मुद्दा उठाया था। उनका स्पष्ट कहना था कि जो यूरिया खाद की बोरी सरकारी रेट पर 267 रुपये 50 पैसे में मिलनी चाहिए, वही बोरी बाजार में खुलेआम 500 से 700 रुपये में बेची जा रही है।

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बीजेपी का पलटवार: ‘खाद नहीं तो वोट नहीं’ महज एक भ्रम दूसरी तरफ, जब विपक्ष सड़कों पर खाद के लिए हाहाकार मचा रहा है, तब सरकार ‘बलराम कृषि महोत्सव’ आयोजित कर किसानों की बेहतरी के दावे कर रही है। इसी महोत्सव में भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता कल सिंह भाबर ने ई-टोकन और खाद की किल्लत के मुद्दे पर बेबाकी से अपनी बात रखी। क्षेत्र में चल रही ‘खाद नहीं तो वोट नहीं’ की चर्चाओं को उन्होंने विपक्ष द्वारा फैलाया गया भ्रम करार दिया।

कल सिंह भाबर ने साफ कहा कि अगर बाजार में खाद की कमी दिख रही है, तो किसानों को अपनी पुरानी पद्धतियों की ओर लौटना चाहिए। उन्होंने जैविक और प्राकृतिक खेती पर जोर देते हुए मंच से खुद जैविक खाद (जीवामृत) बनाने की विधि साझा की और बताया कि वे स्वयं भी अपने खेतों में इसी देसी खाद का उपयोग करते हैं।

कालाबाजारी रोकने का हथियार या परेशानी का सबब? भाजपा जिलाध्यक्ष भानू भूरिया ने बलराम कृषि महोत्सव में किसानों के साथ अपनी बात साझा करते हुए कहा कि ई टोकन पर भ्रम ज्यादा फैलाया जा रहा है । नई व्यवस्था से शुरूआत में थोड़ी बहुत दिक्कत आती है । लेकिन समय के साथ इसके फायदे भी दिखने लगते हैं ।

भाजपा नेताओं का तर्क है कि सरकार किसानों को खाद पर भारी सब्सिडी देती है, लेकिन बीच के कुछ दलाल और मुनाफाखोर इस सब्सिडी वाले खाद को ब्लैक मार्केट (बाजार) में ऊंचे दामों पर बेच देते हैं। इसी कालाबाजारी और घपलेबाजी को रोकने के लिए ही सरकार ने ई-टोकन व्यवस्था लागू की है, ताकि खाद सीधे असली किसान के हाथों में पहुंचे। भाजपा इसे एक पारदर्शी और महत्वपूर्ण कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे पूरी तरह फेल और किसानों को लाइनों में खड़ा करने वाली तानाशाही व्यवस्था करार दे रही है।

सियासत अपनी जगह है और बयानबाजी अपनी जगह, लेकिन इस ई-टोकन व्यवस्था का असली नफा-नुकसान एसी कमरों में बैठे नेता नहीं, बल्कि वह किसान ही सही ढंग से बता सकता है जो अपना खेत और काम छोड़कर दिन-रात सोसायटियों के बाहर लाइन में खड़ा है। कितना और कैसे खाद मिल रहा है वो ही बेहतर ढंग से जानता है ।

बाकी तो जो है सो है ही ।

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संस्थापक और संपादक है, 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं । नेशनल,रीजनल चैनल में रिपोर्टिंग का अनुभव । डिजिटल पत्रकार के रूप मे भी सक्रिय हैं.

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