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झाबुआ के कुशलपुरा में 1500 साल पुराना शिवलिंग, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी शिकार

झाबुआ का कुशलपुरा गाँव: 1500 साल पुराना शिवलिंग और संरक्षण की माँग मध्यप्रदेश का झाबुआ जिला, जो अपनी आदिवासी संस्कृति और भगोरिया हाट के लिए..

1500 साल पुराना शिव मंदिर

झाबुआ का कुशलपुरा गाँव: 1500 साल पुराना शिवलिंग और संरक्षण की माँग


मध्यप्रदेश का झाबुआ जिला, जो अपनी आदिवासी संस्कृति और भगोरिया हाट के लिए प्रसिद्ध है, अपने अंदर एक समृद्ध प्राचीन इतिहास भी समेटे हुए है। जिले के छोटे से गाँव कुशलपुरा में 1500 साल पुराना शिवलिंग इस इतिहास का एक जीवंत प्रमाण है। कुशलपुरा, झाबुआ से मात्र 8 किलोमीटर दूर अहमदाबाद-इंदौर स्टेट हाईवे पर स्थित है, और इसकी आबादी लगभग 700 है। यह गाँव 2002 में उस समय चर्चा में आया, जब सड़क निर्माण के दौरान खुदाई में यह गुप्तकालीन शिवलिंग मिला।

सड़क निर्माण के दौरान निकला शिवलिंग, आदिवासी पूजारी करते हैं पूजा ।
साल 2002 में सड़क निर्माण के दौरान कुशलपुरा गाँव के पास खुदाई में यह प्राचीन शिवलिंग मिला। ग्रामीणों के अनुसार, शिवलिंग की ऊँचाई करीब 5 फीट है और इसका वजन 3 क्विंटल से अधिक है। खुदाई के बाद इसे पास के गाँव में ले जाया गया, लेकिन बाद में कुशलपुरा के ग्रामीणों ने इसे वापस लाकर एक छोटी कुटिया में स्थापित कर दिया। 2023 में ग्रामीणों ने इसे कुटिया से निकालकर उसी स्थान पर एक छोटा मंदिर बनाया, जहाँ से यह खुदाई में निकला था। इस मंदिर में ग्रामीण पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं, खासकर शिवरात्रि, सावन मास, और हर सोमवार को।

1500 साल पुराना शिव मंदिर

शिवलिंग की विशेषताएँ और चमत्कारिक मान्यताएँ
यह शिवलिंग गुप्तकालीन माना जाता है, जो 4वीं से 6वीं शताब्दी के बीच का है। इसके बीच में एक त्रिशूल का निशान बना हुआ है, जो इसे और भी अनूठा बनाता है। कई लोग इसे जनेऊधारी शिवलिंग भी मानते हैं । ग्रामीणों और भक्तों का मानना है कि यह शिवलिंग चमत्कारिक है और यहाँ की गई कामनाएँ पूर्ण होती हैं। भक्त गब्बू ने बताया कि उन्होंने ऐसा अनोखा शिवलिंग कहीं और नहीं देखा। ग्रामीण मोहन ने कहा कि पिछले 18 सालों से गाँव के बुजुर्ग भगत कमता यहाँ पूजा-अर्चना कर रहे हैं, और यह स्थान भक्ति का केंद्र बन चुका है।

संरक्षण की अनदेखी: ग्रामीणों की माँग
इस प्राचीन धरोहर को संरक्षित करने की सख्त जरूरत है, लेकिन 2025 तक न तो प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों ने इस ओर गंभीरता दिखाई है। ग्रामीण चाहते हैं कि इस शिवलिंग के स्थान पर एक भव्य मंदिर बनाया जाए और कुशलपुरा को एक दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाए। ग्रामीण मोहन ने बताया कि यदि यहाँ मंदिर बनाया जाए, तो गाँव को एक नई पहचान मिल सकती है और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन सरकार और जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण यह धरोहर उपेक्षित पड़ी है।

झाबुआ का पुरातात्विक महत्व
झाबुआ जिले में कुशलपुरा का यह शिवलिंग अकेला उदाहरण नहीं है। जिले के अन्य क्षेत्रों में भी प्राचीन मंदिर, मूर्तियाँ, और अवशेष मिले हैं। उदाहरण के लिए, रानापुर से 12 किलोमीटर दूर देवलफलिया में 1100-1200 साल पुराना शिव मंदिर है, जिसमें पंचमुखी शिवलिंग और एक बारहमासी जलधारा है। झाबुआ से 8 किलोमीटर दूर देवझिरी में भी एक प्राचीन शिव मंदिर है, जो सुनार नदी के किनारे स्थित है। ये सभी स्थल जिले के समृद्ध पुरातात्विक इतिहास को दर्शाते हैं, लेकिन इन्हें संरक्षित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

आवश्यक कदम और भविष्य की संभावनाएँ
झाबुआ के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए सरकार को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए। कुशलपुरा में इस शिवलिंग के लिए एक मंदिर का निर्माण और गाँव को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना न केवल धरोहर को संरक्षित करेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देगा। पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र में व्यापक सर्वेक्षण करना चाहिए, ताकि अन्य छुपी हुई धरोहरों को भी सामने लाया जा सके। ग्रामीणों की माँग है कि प्रशासन इस प्राचीन धरोहर को सहेजने के लिए उचित निर्णय ले, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस इतिहास से रूबरू हो सकें।

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