एमपी राज्यसभा चुनाव: 3 सीटों का सियासी गणित और दिग्गजों की साख
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की 3 सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू होते ही दोनों बड़े दलों में चेहरों को लेकर मंथन गहरा गया है। 1 जून से शुरू हुए नामांकन और 18 जून को होने वाली वोटिंग के बीच असली मुकाबला इस बात का है कि पार्टियां अपनी अंदरूनी राजनीति और सामाजिक समीकरणों को कैसे संतुलित करती हैं। अब सभी की नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि उम्मीदवार कौन होगा । पार्टियां जल्द नामों का ऐलान करने वाली हैे क्योंकि 8 जून नामांकन की आखरी तारीख है ।
विधानसभा का वोट गणित और सीटों का समीकरण
मध्य प्रदेश विधानसभा की 229 सीटों (एक सीट रिक्त ) के मौजूदा गणित के हिसाब से राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 विधायकों के वोटों की जरूरत है। भारतीय जनता पार्टी के पास अपने 164 विधायकों के दम पर दो सीटें पूरी तरह सुरक्षित हैं और इन दोनों को जिताने के बाद भी उसके पास 48 अतिरिक्त वोट बचेंगे। वहीं, कांग्रेस के पास अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है, बशर्ते चुनाव के दौरान कोई क्रॉस वोटिंग या भीतरघात न हो। मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार पर कोर्ट की शर्तों और निर्मला सप्रे के तकनीकी पेंच के बीच कांग्रेस के लिए अपनी इस एक सीट को सुरक्षित रखना बेहद अहम हो गया है। कांग्रेस के पास 62 विधायक है, चाहिए 58 ।
कांग्रेस खेमे में नाम की रेस और दिल्ली का फैसला
विपक्ष की ओर से इस बार राज्यसभा कौन जाएगा, इसे लेकर शुरुआती स्तर पर कई बड़े नेताओं के रुख साफ हो चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इस बार चुनाव लड़ने से पहले ही इनकार कर चुके हैं, जिसके बाद पार्टी के भीतर नए विकल्पों पर विचार हो रहा है। फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी के नामों की सबसे ज्यादा चर्चा राजनीतिक गलियारों में तैर रही है। हालांकि, प्रदेश संगठन के भीतर से यह मांग भी उठ रही है कि इस बार किसी आदिवासी, पिछड़े वर्ग या युवा चेहरे को मौका देकर कार्यकर्ताओं में नया संदेश दिया जाए, लेकिन इस इकलौती सीट पर अंतिम मुहर दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तिकड़ी ही लगाएगी।

बीजेपी की दुविधा और कद्दावर नेताओं का पुनर्वास
सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए दो सीटों पर उम्मीदवारों का चयन करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है, क्योंकि पार्टी के भीतर दावेदारों की सूची बहुत लंबी है। चर्चाओं में सबसे ऊपर कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल जैसे कद्दावर नेताओं के नाम हैं, जिन्हें लेकर राजनीतिक हलकों में यह कयास लगाए जाते रहे हैं कि वे सरकार की मुख्यधारा से थोड़े कटे-कटे महसूस कर रहे हैं। इनके अलावा नरोत्तम मिश्रा और अरविंद भदौरिया जैसे रणनीतिकारों के नामों की भी सुगबुगाहट है जो विधानसभा चुनाव हारने के बाद से दिल्ली की राजनीति में पुनर्वास की राह देख रहे हैं।
झाबुआ का अप्रत्याशित दांव और संघ का समन्वय
बीजेपी के पारंपरिक गढ़ मालवा-निमाड़ और विशेषकर झाबुआ अंचल से इस बार दो बेहद चौंकाने वाले नाम रेस में सामने आ रहे हैं। इनमें पूर्व सांसद जीएस डामोर का नाम प्रशासनिक व राजनीतिक अनुभव के कारण चर्चा में है, तो दूसरी तरफ शिवगंगा अभियान के जरिए जल संरक्षण और सामाजिक चेतना का काम करने वाले महेश शर्मा का नाम तेजी से उभरा है। और उनका नाम आना बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जहां वह गैर-राजनीतिक और जमीनी स्तर पर काम करने वाले चेहरों को अचानक आगे लाकर सबको चौंका देती है। लेकिन ये भी झाबुआ जैसे आदिवासी जिले से इसको लेकर विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है ।
पूर्व सांसद जीएस डामोर का नाम चर्चाओं में है । एसटी चेहरा है । विधायक रहे हैं, सांसद बने । उनके पक्ष में एक बात संगठन तक पहुंची है कि सांसद का टिकट कटने के बाद कभी भी उन्होंने खुलकर पार्टी के फैसले का विरोध नहीं किया । ना कोई प्रदर्शन किया ना करवाया, पार्टी के फैसले को स्वीकार कर लिया । बीजेपी के के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का कहना है कि संगठन स्तर से नाम तय हो चुके हैं, फैसला आला कमान को ही लेना है । मतलब नाम तय है बस घोषणा होने की देर है ।
दो पद और समीकरणों को साधने की मजबूरी
बीजेपी की पिछले कुछ वर्षों की कार्यशैली रही है कि जिन नामों की मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वे अक्सर अंतिम सूची से गायब हो जाते हैं और कोई बिल्कुल नया चेहरा बाजी मार लेता है। इस बार भी विश्लेषक कई तरह के कयास लगा रहे हैं, लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि सीटें केवल दो हैं और दावेदार अनेक हैं। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व और संघ के समन्वय से बनने वाली अंतिम सूची में नाराज मंत्रियों को संतुष्ट किया जाएगा, या फिर ओबीसी, एसटी, महिला प्रतिनिधित्व और संघ की विशुद्ध पसंद को प्राथमिकता दी जाएगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।













