झाबुआ (Jhabua Post): पेट्रोल और डीजल की मार झेल रही आम जनता को महंगाई का एक और बड़ा झटका लगा है। घरेलू रसोई गैस (LPG Cylinder) की कीमतों में एक बार फिर आग लग गई है। इस बार सिलेंडर के दाम 29 रुपये बढ़ा दिए गए हैं। बढ़ती कीमतों ने आम आदमी के घर का बजट और रसोई का खर्च पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है।
3 महीनों में 89 रुपये तक बढ़े दाम
गैस सिलेंडर की कीमतों में यह बढ़ोतरी कोई पहली बार नहीं हुई है। इससे ठीक पहले मार्च महीने में भी सिलेंडर के दामों में 60 रुपये का सीधा उछाल आया था। मार्च और अब हुए इस नए इजाफे को मिला लें, तो पिछले 3 महीनों के भीतर ही घरेलू गैस सिलेंडर 89 रुपये तक महंगा हो चुका है।
- झाबुआ में नई कीमत: इन ताजा बढ़ोतरी के बाद झाबुआ शहर में एचपी (HP) गैस सिलेंडर की कीमत अब 986.50 रुपये तक पहुंच गई है। अलग-अलग स्थान और गैस कंपनी के हिसाब कीमत अलग-अलग हो सकती है ।

कांग्रेस का तंज: “महंगाई मैन मोदी का चाबुक”
कीमतों में इस वृद्धि को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने सोशल मीडिया के जरिए सीधे केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस ने अपनी पोस्ट में तंज कसते हुए लिखा है- “महंगाई मैन मोदी का चाबुक फिर चला।” कांग्रेस का आरोप है कि सरकार की नीतियां सीधे तौर पर आम आदमी की जेब खाली कर रही हैं।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं गैस के दाम?
भारत में एलपीजी गैस की कीमतें हर महीने की 1 तारीख को तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा तय की जाती हैं। यह कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के औसत और एक्सचेंज रेट पर निर्भर करती हैं। वर्तमान में जो लगातार बढ़ोतरी हो रही है, उसके पीछे 4 प्रमुख तथ्यात्मक कारण हैं:
1. लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट (Shipping Crisis): दुनिया का लगभग 20% से 30% तेल और गैस ‘होर्मुज स्ट्रेट’ (Strait of Hormuz) और लाल सागर से होकर गुजरता है। यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों और समुद्री रास्तों पर असुरक्षा के कारण मालवाहक जहाजों (Cargo Ships) को अब अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ का लंबा चक्कर लगाकर आना पड़ रहा है। इस लंबे रूट के कारण शिपिंग और माल ढुलाई (Freight) का खर्च कई गुना बढ़ गया है, जिसका सीधा असर गैस की कीमतों पर पड़ा है।
2. ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच युद्ध के हालात: मध्य पूर्व (Middle East) कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच लगातार बने हुए युद्ध के हालातों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता आती है, कच्चे तेल और गैस के दाम ग्लोबल मार्केट में उछाल मारते हैं।
3. भारत की 60% आयात पर निर्भरता (Import Dependency): यह एक बड़ा तथ्य है कि भारत अपनी घरेलू एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात (Import) करता है। चूँकि हम अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा हिस्सा बाहर से मंगाते हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस महंगी होने या शिपिंग चार्ज बढ़ने का सीधा और त्वरित असर भारतीय बाजार पर होता है।
4. डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी: अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और कच्चे तेल की पूरी खरीद-फरोख्त अमेरिकी डॉलर (USD) में होती है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) की स्थिति में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर तेल कंपनियों के बिल पर पड़ता है। रुपये के कमजोर होने से भारत को गैस आयात करने के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं, जिसकी भरपाई अंततः आम उपभोक्ता की जेब से की जाती है।
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