MP Bus Fare Hike: 55% तक महंगा हुआ बसों का सफर! ट्रेन में धक्के, पेट्रोल 115 के पार… आखिर कहां जाए आम आदमी?

MP Bus Fare Hike: मध्य प्रदेश में महंगाई की मार झेल रही आम जनता को एक और बड़ा और सीधा झटका लगा है। राज्य सरकार ने बसों के किराये में भारी बढ़ोतरी कर दी है। यह वृद्धि मामूली नहीं, बल्कि 40 से 55 प्रतिशत तक है। बस ऑपरेटरों की हड़ताल की चेतावनी के आगे घुटने…

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MP Bus Fare Hike: मध्य प्रदेश में महंगाई की मार झेल रही आम जनता को एक और बड़ा और सीधा झटका लगा है। राज्य सरकार ने बसों के किराये में भारी बढ़ोतरी कर दी है। यह वृद्धि मामूली नहीं, बल्कि 40 से 55 प्रतिशत तक है। बस ऑपरेटरों की हड़ताल की चेतावनी के आगे घुटने टेकते हुए सरकार ने नया फरमान जारी कर दिया है, जिसके बाद अब बसों का न्यूनतम किराया 10 रुपये हो गया है, वहीं यात्रियों को अब 2 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से अपनी जेब ढीली करनी होगी।

इस अचानक हुई किराया वृद्धि ने जनता में भारी गुस्सा भर दिया है। खासकर उन लोगों के लिए जो रोजमर्रा के काम से बसों में अपडाउन करते हैं, यह फैसला उनकी जेब पर बहुत भारी पड़ने वाला है।

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MP Bus Fare Hike: बस ऑपरेटरों का तर्क vs जनता की मजबूरी

बसों के किराये को लेकर हमेशा से दो पक्ष रहे हैं। बस मालिकों का तर्क है कि लगातार बढ़ते डीजल के दाम, मेंटेनेंस और अन्य खर्चों के कारण उन्हें भारी नुकसान हो रहा था, इसलिए किराया बढ़ाना उनकी मजबूरी थी।

लेकिन सवाल यह है कि क्या एक झटके में 40 से 55 प्रतिशत की वृद्धि जायज है? 2 रुपये प्रति किलोमीटर का किराया आम आदमी की कमर तोड़ने के लिए काफी है। क्या इतना भारी किराया वसूलने के बाद बस ऑपरेटर आम जनता को वैसी ‘सुविधाएं’ भी देंगे? खटारा बसें, ठूंस-ठूंस कर भरी सवारियां और मनमाना रवैया… क्या इस भारी भरकम किराये के बाद ये सब बंद हो जाएगा?

विकल्पों का टोटा: आम आदमी के पास कोई रास्ता नहीं

इस महंगाई के दौर में अगर कोई बस से सफर नहीं करना चाहे, तो उसके पास विकल्प क्या बचते हैं? आइए हकीकत देखते हैं:

  • निजी वाहन चलाना मुश्किल: पेट्रोल और डीजल के आसमान छूते दामों ने खुद का वाहन निकालना मुश्किल कर दिया है। झाबुआ में ही पेट्रोल 115 रुपये 61 पैसे प्रति लीटर है, तो डीजल भी 100 रुपये के पार जा चुका है।
  • ट्रेनों में भी आम आदमी के लिए नहीं जगह : झाबुआ जैसे जिलों में ट्रेन की कनेक्टिविटी वैसे ही कम है। लंबी दूरी की यात्रा के लिए आरक्षण मिलना किसी लॉटरी से कम नहीं है। और सामान्य कोच (General Coach) में यात्रा करने का मतलब है ‘किसी जंग में उतरना’।

ऐसे में आम आदमी न तो खुद की गाड़ी से जा सकता है, न ट्रेन का भरोसा कर सकता है। वह बसों पर निर्भर है और इसी मजबूरी का फायदा उठाकर उसकी जेब काटी जा रही है।

जनकल्याणकारी सरकार या बस ऑपरेटरों की सरकार?

सरकार की नीतियों में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है। एक तरफ सरकार पर्यावरण और ईंधन बचाने के लिए लोगों को प्रेरित करती है कि वे निजी वाहनों का उपयोग कम करें और ‘सार्वजनिक परिवहन’ (Public Transport) का ज्यादा इस्तेमाल करें। लेकिन जब सार्वजनिक परिवहन का किराया ही इतना बेतहाशा बढ़ा दिया जाएगा, तो लोग इसके लिए हतोत्साहित ही होंगे।

सुविधाओं की भारी कमी और किराये में आग लगने से लोग सार्वजनिक परिवहन से मुंह मोड़ने को मजबूर हैं। एक ‘जनकल्याणकारी’ सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह बस मालिकों और जनता के बीच कोई ऐसा बीच का रास्ता निकालेगी जिससे किसी का नुकसान न हो। लेकिन इस फैसले ने साबित कर दिया है कि सरकार ने आम आदमी के हितों की बजाय बस ऑपरेटरों के साथ जाना ज्यादा पसंद किया है।

बाकी तो जो है सो है ही।

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संस्थापक और संपादक है, 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं । नेशनल,रीजनल चैनल में रिपोर्टिंग का अनुभव । डिजिटल पत्रकार के रूप मे भी सक्रिय हैं.

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