MP By Elections : मध्य प्रदेश में दिसंबर 2023 में डॉ. Mohan Yadav के मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने के बाद से अब तक (अगस्त 2026 तक) प्रदेश में चार अलग-अलग विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं। पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए इन 4 उपचुनावों के नतीजे किसी बड़े राजनीतिक सबक से कम नहीं हैं।
चार में से दो सीटों (अमरवाड़ा और बुधनी) पर जहां बीजेपी अपनी साख बचाने में कामयाब रही, वहीं दो सीटों (विजयपुर और दतिया) पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने बाजी मार ली। इन चार उपचुनावों का सीटवार रिपोर्ट कार्ड और इनके पीछे छिपा बड़ा सियासी संदेश:
MP by Election चार उपचुनावों का रिपोर्ट कार्ड
1. अमरवाड़ा (जुलाई 2024) – बीजेपी की नजदीकी जीत
- विजेता: कमलेश शाह (बीजेपी)
- निकटतम प्रतिद्वंद्वी: धीरन शाह इनावती (कांग्रेस)
- जीत का अंतर: 3,027 वोट
- सियासी मायने: कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए कमलेश शाह ने सीट तो बचा ली, लेकिन जीत का मार्जिन बहुत ही कम महज 3 हजार रहा।
2. विजयपुर (नवंबर 2024) – कैबिनेट मंत्री की करारी हार
- विजेता: मुकेश मल्होत्रा (कांग्रेस)
- हार: रामनिवास रावत (बीजेपी)
- जीत का अंतर: 7,364 वोट
- सियासी मायने: बीजेपी ने कांग्रेस से पाला बदलकर आए दिग्गज नेता रामनिवास रावत को मोहन सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर चुनाव में उतारा था, लेकिन जनता ने दल-बदल और सत्ता के इस प्रयोग को पूरी तरह नकार दिया। मंत्री रहते हुए चुनाव हारने का भी ये अनोखा मामला है । क्योंकि कई बार उपचुनाव ऐसे भी देखे गए हैं जहां मतदाताओं के बीच इस बात को लेकर भी जाया जाता है कि विधायक बने तो मंत्री भी बनेंगे । ऐसा झाबुआ विधानसभा के उपचुनाव 2019 में हुआ था, जब इस बात को प्रचारित किया गया था, कि कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया चुनाव जीते तो मंत्री बनेंगे ।
3. बुधनी (नवंबर 2024) – पारंपरिक गढ़ में सिमटता मार्जिन
- विजेता: रमाकांत भार्गव (बीजेपी)
- हार : राजकुमार पटेल (कांग्रेस)
- जीत का अंतर: 13,901 वोट
- सियासी मायने: पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के सांसद बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर जीत तो बीजेपी की हुई, लेकिन आंकड़ों ने पार्टी को चौंका दिया। जहां शिवराज सिंह चौहान 1 लाख से ज्यादा की भारी जीत मिली थी, वहीं बीजेपी के लिए इस उपचुनाव में जीत अंतर सिमट कर 13 हजार पर पहुंच गया ।
4. दतिया (अगस्त 2026) – भितरघात और कांग्रेस की वापसी
- विजेता: घनश्याम सिंह (कांग्रेस)
- हार : आशुतोष तिवारी (बीजेपी)
- जीत का अंतर: 6,016 वोट
- सियासी मायने: कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को आपराधिक मामले में सजा मिलने के कारण यह सीट खाली हुई थी, जहां कांग्रेस ने जीत दर्ज कर बीजेपी को दूसरा बड़ा झटका दिया। बीजेपी की इस हार की चर्चा देश भर में है । सरकार मंत्री , सगंठन सभी लगते हैं चुनाव में लेकिन भाजपा के लिए परिणाम चौंकाने वाले रहे । इस हार के बाद बीजेपी ने सभी संगठनात्मक ईकाईयों को भंग कर दिया । हार का ठिकरा पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा पर फोड़ा जा रहा है , जो इस चुनाव में दावेदारी कर रहे थे, पार्टी संगठन ने आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया ।
पूर्ण बहुमत की सरकार के लिए क्यों हैं ये नतीजे ‘अलार्मिंग’?

1. कैबिनेट मंत्री का सीधे चुनाव हारना
विजयपुर उपचुनाव में सत्ता में रहते हुए किसी मौजूदा कैबिनेट मंत्री (रामनिवास रावत) का चुनाव हार जाना मोहन यादव सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना गया। इसने संदेश दिया कि सिर्फ मंत्री पद का प्रभाव जनता को लुभाने के लिए काफी नहीं है।
2. ‘गढ़’ बुधनी में मार्जिन का तेजी से गिरना
वर्ष 2023 के मुख्य विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पारंपरिक बुधनी सीट 1.04 लाख से ज्यादा वोटों के ऐतिहासिक अंतर से जीती थी। लेकिन महज एक साल बाद हुए उपचुनाव में बीजेपी का यह जीत का मार्जिन घटकर सिर्फ 13,901 वोटों पर आ टिका। यह अंतर सीधे तौर पर समर्थकों के बीच घटती दीवानगी और स्थानीय स्तर पर जमीनी असंतोष की ओर इशारा करता है।
3. दतिया में भितरघात और गुटबाजी का विस्फोट
दतिया उपचुनाव में पूर्व गृहमंत्री और पार्टी के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा के बजाय आशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया था। इसके बाद पार्टी के भीतर असंतोष और अंदरूनी भितरघात खुल कर सामने आया। स्थिति यह रही कि नरोत्तम मिश्रा का मजबूत गढ़ माने जाने वाले पोलिंग बूथ (नंबर 121) पर भी बीजेपी उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके साथ चुनाव के दौरान ही राम मंदिर चंदा चोरी और नीट पेपर लीक के बाद जंतर-मंतर आंदोलन की आंच भी वजह रही । हांलाकि सत्ता पक्ष इन दोनों को दरकिनार भी नहीं कर रही है और स्वीकार भी नहीं ।
4. उम्मीदवार चयन और रणनीति पर सवाल
श्योपुर (विजयपुर) के बाद दतिया में लगातार दूसरी हार सीधे तौर पर बीजेपी के केंद्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया, चुनावी रणनीति और अंदरूनी एकजुटता पर सवाल खड़े करती है। नतीजों से साफ है कि पुराने और कद्दावर नेताओं को साइडलाइन करने से उनके समर्थकों का कैडर वोट नए प्रत्याशी को ट्रांसफर नहीं हो पा रहा है।
मध्य प्रदेश में आगामी आम चुनावों से पहले ये 4 उपचुनाव सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का संदेश लेकर आए हैं, जबकि कांग्रेस के लिए इन नतीजों ने कैडर में नया उत्साह फूंकने का काम किया है।
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